Monday, August 17, 2026
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 JUDGES PERFORMANCE: कुछ हाईकोर्ट जज अपना काम ठीक से नहीं कर पा रहे, क्यों बिफरा सुप्रीम कोर्ट

 JUDGES PERFORMANCE: सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई कि कुछ हाईकोर्ट जज अपने कार्यों को पूरा करने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं।

हाईकोर्ट के जजों के लिए “स्कूल प्रिंसिपल” की तरह काम नहीं करना चाहते: सुप्रीम

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि वह हाईकोर्ट के जजों के लिए “स्कूल प्रिंसिपल” की तरह काम नहीं करना चाहती, लेकिन एक स्व-प्रबंधन व्यवस्था (self-management system) होनी चाहिए ताकि “फाइलें उनकी मेज पर पड़ी न रह जाएं।” अदालत ने कहा, उनके प्रदर्शन मूल्यांकन (performance evaluation) की आवश्यकता है। पीठ ने कहा, कुछ जज दिन-रात काम करते हैं और अद्भुत ढंग से मामलों का निपटारा कर रहे हैं। लेकिन उसी समय कुछ जज ऐसे भी हैं जो दुर्भाग्यवश अपेक्षित कार्य नहीं कर पा रहे— कारण चाहे जो भी हों, अच्छे या बुरे, हमें नहीं पता। संभव है कुछ परिस्थितियाँ भी हों।

कुछ जजों में अनावश्यक रूप से केस स्थगित (adjourn) करने की आदत

जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी टिप्पणी की कि कुछ जजों में अनावश्यक रूप से केस स्थगित (adjourn) करने की आदत होती है, और यह उनकी छवि के लिए हानिकारक हो सकता है। उन्होंने कहा, “हर जज को ऐसा स्व-प्रबंधन सिस्टम होना चाहिए जिससे उनकी मेज पर केस फाइलें जमा न हों। कुछ जजों को ज्यादा से ज्यादा मामले सुनने की आदत या बेचैनी होती है, और नतीजा यह होता है कि वे बिना वजह सुनवाई टाल देते हैं।” पीठ ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले में कहा गया था कि अगर किसी मामले में केवल आदेश का परिचालन हिस्सा सुनाया गया है, तो फैसले का पूरा कारणयुक्त भाग पाँच दिन के भीतर दिया जाना चाहिए। जब तक सुप्रीम कोर्ट उस समय-सीमा में बदलाव नहीं करती, हाईकोर्ट को इसका पालन करना ही होगा।

स्पष्ट मानदंड और दिशा-निर्देश तय किए जाने ज़रूरी

पीठ ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई जज क्रिमिनल अपील सुन रहा है, तो हम यह उम्मीद नहीं करते कि वह दिन में 50 मामले निपटा देगा। एक दिन में एक क्रिमिनल अपील का फैसला देना ही बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन यदि जमानत (बेल) मामले में कोई जज कहता है कि वह एक दिन में सिर्फ एक ही केस निपटाएगा, तो यह आत्ममंथन का विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि जजों के कामकाज का मूल्यांकन होना चाहिए, लेकिन इसके लिए स्पष्ट मानदंड और दिशा-निर्देश तय किए जाने ज़रूरी हैं। अदालत ने कहा, “हमारा इरादा स्कूल प्रिंसिपल बनने का नहीं है। लेकिन व्यापक दिशा-निर्देश होने चाहिए ताकि जज यह जान सकें कि उनके सामने क्या कार्य है और कितना कार्य उन्हें निपटाना चाहिए। जनता को न्यायपालिका से वैध अपेक्षा है।”

झारखंड हाईकोर्ट ने उनकी आपराधिक अपीलों पर वर्षों से फैसला सुरक्षित

सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां उस समय आईं जब कुछ आजीवन कारावास और फांसी की सज़ा पाए कैदियों ने याचिका दायर कर आरोप लगाया कि झारखंड हाईकोर्ट ने उनकी आपराधिक अपीलों पर वर्षों से फैसला सुरक्षित रखा हुआ है। हालांकि बाद में हाईकोर्ट ने फैसले सुनाए और कई अभियुक्तों को बरी कर दिया। अधिवक्ता फौज़िया शकील ने अदालत को विभिन्न हाईकोर्ट्स से लंबित फैसलों की स्थिति पर चार्ट सौंपा और कहा कि कुछ हाईकोर्ट्स ने तय प्रारूप में डेटा उपलब्ध नहीं कराया। पीठ ने उन्हें निर्देश दिया कि दो हफ्तों के भीतर उन मामलों का डेटा दाखिल करें जिनमें फैसला सुरक्षित रखा गया, फैसला सुनाने की तारीख और फैसले को वेबसाइट पर अपलोड करने की तारीख दी जाए। वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत सिन्हा को भी इस मामले में सहयोग करने को कहा गया।

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