Tuesday, August 4, 2026
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Bail orders: न्यायिक अधिकारियों को विशेष ट्रेनिंग दी जाए….सुप्रीम कोर्ट ने जमानत पर कही बड़ी बात

Bail orders: सुप्रीम कोर्ट ने ठगी के एक मामले में आरोपियों को मिली जमानत रद्द करते हुए एडिशनल चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट (ACMM) और सेशन जज की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है।

कम से कम सात दिन का विशेष न्यायिक प्रशिक्षण लेने का आदेश

शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर वह इस तरह से दी गई जमानत पर आंख मूंद लेती तो अपने कर्तव्य से चूक जाती। कोर्ट ने माना कि मामले के तथ्यों को देखते हुए इन आदेशों को पारित करने वाले न्यायिक अधिकारियों का विशेष प्रशिक्षण लेना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कड़कड़डूमा कोर्ट के ACMM और सेशन जज द्वारा दी गई जमानत को बरकरार रखा गया था। अदालत ने दोनों न्यायिक अधिकारियों को कम से कम सात दिन का विशेष न्यायिक प्रशिक्षण लेने का आदेश दिया है।

यह था मामला

आरोपी दंपति पर आरोप है कि उन्होंने जमीन ट्रांसफर के नाम पर 1.9 करोड़ रुपये लिए थे, जबकि जमीन पहले से ही गिरवी रखी गई थी और बाद में किसी तीसरे पक्ष को बेच दी गई। पैसे लौटाने से इनकार करने पर एफआईआर दर्ज की गई थी।

दिल्ली न्यायिक अकादमी में विशेष प्रशिक्षण दिया जाए: सुप्रीम अदालत

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया है कि दिल्ली न्यायिक अकादमी में इस विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए। इसमें खास जोर न्यायिक अधिकारियों को इस बात के प्रति संवेदनशील बनाने पर होगा कि वे उच्च न्यायालयों के निर्णयों का सम्मान करें और न्यायिक कार्यवाही को उचित तरीके से संचालित करें। साथ ही, दिल्ली हाईकोर्ट की ज्यूडिशियल एजुकेशन एंड ट्रेनिंग प्रोग्राम कमेटी के अध्यक्ष जज को भी इस आदेश की जानकारी देने को कहा गया है।

जांच अधिकारियों (IOs) की भूमिका भी नजरअंदाज नहीं कर सकते

कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारियों (IOs) की भूमिका भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। दिल्ली पुलिस आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से जांच कर कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने कहा कि ACMM द्वारा जमानत देते समय अपनाए गए विचार “विकृत” थे और जमानत पर निर्णय लेते समय सबसे पहले मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर ध्यान देना चाहिए। अदालत ने माना कि इस मामले में जमानत दिया जाना उचित नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसकी टिप्पणियां ‘प्रो-लिबर्टी’ सिद्धांत को कमजोर करने के लिए नहीं हैं, बल्कि निचली अदालतों को यह याद दिलाने के लिए हैं कि इन सिद्धांतों को विशेष तथ्यों पर लागू करना चाहिए। अदालत ने हैरानी जताई कि 10 नवंबर 2023 के जमानत आदेश में आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट में उपलब्ध सामग्री पर कोई विचार नहीं किया गया।

जमानत देने के तरीके निचली अदालत में साेचनीय

कोर्ट ने यह भी पाया कि जमानत देने के तरीके ने निचली अदालतों के स्तर पर प्रक्रियात्मक अनियमितताओं को उजागर किया है। यहां तक कि कोई रिकॉर्ड नहीं मिला कि आरोपियों को अंतिम आदेश से पहले औपचारिक रूप से रिहा किया गया था, फिर वे कैसे बाहर आ गए? अदालत ने कहा कि सामान्यत: तथ्यों की कमी वाली जमानत चुनौती से बच सकती है, लेकिन इस मामले में तथ्यों ने गहन जांच जरूरी बना दी। प्रॉसिक्यूशन ने अदालत को बताया कि आरोपी आदतन अपराधी हैं और इसी तरह की धोखाधड़ी के कई मामलों में शामिल हैं। वे दो मामलों में दोषी करार दिए जा चुके हैं और छह अन्य मामलों में मुकदमे चल रहे हैं। अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोपियों ने 2019 में मध्यस्थता के नाम पर अंतरिम सुरक्षा हासिल की थी, लेकिन चार साल बाद भी कोई प्रगति नहीं हुई।

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CRIMINAL APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL APPEAL NO.4283 OF 2025
[@ SPECIAL LEAVE PETITION (CRIMINAL) NO.4971 OF 2025]
M/S NETSITY SYSTEMS PVT. LTD. …APPELLANT
VERSUS
THE STATE GOVT. OF NCT OF DELHI & ANR. …RESPONDENTS
R1: THE STATE GOVT. OF NCT OF DELHI
R2: DHARAM PAL SINGH RATHORE
WITH
CRIMINAL APPEAL NO.4284 OF 2025
[@ SPECIAL LEAVE PETITION (CRIMINAL) NO.7587 OF 2025]
M/S NETSITY SYSTEMS PVT. LTD. …APPELLANT
VERSUS
THE STATE NCT OF DELHI & ANR. …RESPONDENTS
R1: THE STATE NCT OF DELHI
R2: SHIKSHA RATHORE

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