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One-sided divorce decree: तलाक जैसे संवेदनशील मामलों में जल्दबाजी से फैसला देना न्याय के साथ अन्याय…पढ़ें मामला

One-sided divorce decree: बॉम्बे हाईकोर्ट ने ठाणे के व्यक्ति का तलाक रद्द किया व कहा, ‘फैमिली कोर्ट ने बिना दिमाग लगाए, बेहद लापरवाही से फैसला सुनाया है।

एकतरफा तलाक (Ex parte divorce decree) रद्द किया

बॉम्बे हाईकोर्ट ने ठाणे के एक व्यक्ति को दिया गया एकतरफा तलाक (Ex parte divorce decree) रद्द कर दिया है, यह कहते हुए कि फैमिली कोर्ट ने बिना पर्याप्त कारण बताए और “कैजुअल व मैकेनिकल तरीके” से शादी को खत्म कर दिया था। न्यायमूर्ति रेवती मोहिते देरे और संदेश डी. पाटिल की खंडपीठ ने यह आदेश उस अपील पर सुनाया, जिसे महिला ने नवंबर 2024 में पारित तलाक आदेश को चुनौती देते हुए दायर किया था। यह तलाक क्रूरता के आधार पर स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत दिया गया था। दंपती की शादी 18 सितंबर 2017 को हुई थी।

पति की दोबारा शादी के बावजूद तलाक रद्द

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि पति ने तलाक का आदेश मिलने के बाद दोबारा शादी कर ली है। लेकिन हाईकोर्ट ने साफ कहा कि यह तथ्य गलत आदेश को निरस्त करने में बाधा नहीं बन सकता। पीठ ने कहा जब हमने पाया कि फैमिली कोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों के विपरीत है, तब यह तथ्य कि पति ने पुनर्विवाह कर लिया है, हमें निर्णय रद्द करने से नहीं रोक सकता।

फैमिली कोर्ट ने बिना कारण बताए फैसला सुनाया

हाईकोर्ट ने पाया कि ठाणे फैमिली कोर्ट ने यह बताए बिना तलाक दे दिया कि महिला ने अपने पति के साथ क्रूरता कैसे की थी। फैसला केवल इसलिए दिया गया क्योंकि पत्नी ने लिखित जवाब दाखिल नहीं किया और न ही अदालत में पेश हुई। अदालत ने कहा, फैमिली कोर्ट ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उसने किस आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि महिला ने क्रूरता की। केवल इसलिए कि पति की गवाही का खंडन नहीं हुआ, तलाक का आदेश नहीं दिया जा सकता।

पत्नी की ओर से दलील — ‘अदालत को स्वतंत्र रूप से साक्ष्य देखना चाहिए था’

पत्नी की ओर से अधिवक्ता प्रियंका देसाई ने कहा कि भले ही उनकी मुवक्किल ने लिखित जवाब नहीं दिया, लेकिन यह अदालत का दायित्व था कि वह पति की गवाही की स्वतंत्र रूप से जांच करे और पर्याप्त कारण दर्ज करे। वहीं पति की ओर से अधिवक्ता पुष्पा वर्मा और मोईज शेख ने तर्क दिया कि पत्नी ने जानबूझकर अदालत में पेश नहीं होकर कार्यवाही में देरी की। लेकिन पीठ ने पत्नी के पक्ष में सहमति जताई और कहा, “सिर्फ इसलिए कि एक पक्ष अदालत में उपस्थित नहीं हुआ या साक्ष्य नहीं दिया, इसका अर्थ यह नहीं कि फैसला स्वतः उसी के खिलाफ दे दिया जाए। कोर्ट को हर हाल में साक्ष्य का परीक्षण और विवेकपूर्ण निर्णय देना चाहिए।”

केस फिर से फैमिली कोर्ट को भेजा गया

हाईकोर्ट ने तलाक का आदेश रद्द करते हुए मामला फिर से ठाणे फैमिली कोर्ट को भेज दिया। अब महिला को एक माह के भीतर लिखित जवाब दाखिल करने की अनुमति दी गई है। इसके बाद फैमिली कोर्ट को मुद्दे तय करने, दोनों पक्षों को साक्ष्य पेश करने की अनुमति देने और “विस्तृत व कारणयुक्त आदेश” पारित करने के निर्देश दिए गए हैं।
पीठ ने कहा, फैमिली कोर्ट को अब इस मामले को मूल अवस्था से पुनः सुनना होगा और यथाशीघ्र नया आदेश देना होगा। यह आदेश परिवारिक विवादों में न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता पर बल देता है।

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