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UP Judiciary: 17 साल की कानूनी लड़ाई के बाद मिली कईयों को नौकरी…अंबेडकर नगर न्यायालय का मामला

UP Judiciary: सुप्रीम कोर्ट ने अंबेडकर नगर न्यायालय के 4 कर्मचारियों की बर्खास्तगी रद्द की, कहा, “2008 में किया गया निष्कासन अनुचित था।

जिला न्यायालय में थे कार्यरत कक्षा-4 के चार कर्मचारी

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिला न्यायालय में कार्यरत कक्षा-4 के चार कर्मचारियों की 2008 में की गई बर्खास्तगी को रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि उन्हें विज्ञापित रिक्तियों से अधिक नियुक्त किए जाने के आधार पर हटाना गलत था। मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की दो-न्यायाधीशीय पीठ ने कहा कि ऐसे नियुक्तियां नियम 12 के तहत वैध थीं, क्योंकि नियम के अनुसार “उचित अवधि में उत्पन्न अतिरिक्त रिक्तियां” भरी जा सकती थीं।

नियुक्त कर्मचारियों को फिर नौकरी, 60 वर्ष से अधिक वालों को न्यूनतम पेंशन

अदालत ने निर्देश दिया कि जिन कर्मचारियों की उम्र अभी सेवानिवृत्ति (60 वर्ष) से कम है, उन्हें मौजूदा या सुपरन्यूमरेरी (अतिरिक्त) पदों पर फिर से नियुक्त किया जाए, जबकि 60 वर्ष पार कर चुके कर्मचारियों को न्यूनतम पेंशन लाभ दिया जाए। हालांकि राहत केवल इन चार अपीलकर्ताओं तक सीमित रहेगी।

मामला क्या था

इन चार कर्मचारियों की नियुक्ति 2001 में परिचारक (Orderly/Peon) के रूप में हुई थी। यह नियुक्तियां 18 अक्टूबर 2000 को जारी विज्ञापन के आधार पर हुई थीं, जिसमें 12 पद निकाले गए थे — लेकिन विज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि पदों की संख्या “बढ़ या घट सकती है।” साल 2008 में, जिला न्यायालय ने यह कहते हुए उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं कि 6 नियुक्तियां विज्ञापित पदों से अधिक कर दी गईं, जिनमें ये चार भी शामिल थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल व खंडपीठ, दोनों ने बर्खास्तगी को सही ठहराया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा — नियम 12 के तहत नियुक्तियां वैध

अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि उनकी नियुक्तियां उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सिविल कोर्ट अधीनस्थ स्थापना नियमावली, 1955 के नियम 12 के तहत वैध थीं, जो एक “प्रतीक्षा सूची (Waiting List)” बनाने और अगले भर्ती वर्ष तक खाली पद भरने की अनुमति देता है। पीठ ने कहा कि विज्ञापन में पदों की संख्या बढ़ने-घटने की संभावना पहले से बताई गई थी, इसलिए यह नियम 12 और ‘नसीम अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2011)’ के फैसले के अनुरूप है। कोर्ट ने टिप्पणी की, “विज्ञापन में स्पष्ट रूप से बताया गया था कि पदों की संख्या बढ़ या घट सकती है, इसलिए प्रतीक्षा सूची बनाना नियुक्ति प्राधिकारी की मंशा में शामिल था। यह नियम 12 की भावना के अनुरूप है।”

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

“नियम 12 प्रत्येक न्यायालय में चपरासी, आदेशवाहक और फर्राश जैसे पदों के लिए प्रतीक्षा सूची बनाए रखने की अनुमति देता है।” “‘उचित सीमा’ (reasonable dimension) का अर्थ है कि प्रतीक्षा सूची इतनी हो, जिससे भर्ती वर्ष या उसके अगले वर्ष में होने वाली संभावित रिक्तियों को भरा जा सके।” “यह मामला लगभग ‘नसीम अहमद’ के समान है और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस व्याख्या को नजरअंदाज किया।”

17 साल तक बेरोजगार रहने का भी जिक्र

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता 17 वर्षों से नौकरी से बाहर हैं, इसलिए उन्हें केवल सीमित राहत दी जा सकती है। पीठ ने कहा, “यदि किसी अपीलकर्ता ने सेवानिवृत्ति की आयु पार कर ली है, तो उसे न्यूनतम पेंशन दी जाएगी, भले ही उसने केवल आठ वर्ष की सेवा की हो। जिनकी आयु अभी 60 से कम है, उन्हें मौजूदा या अतिरिक्त पदों पर समायोजित किया जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बीते 17 वर्ष की अवधि को ‘सेवा अवधि’ या ‘पेंशन गणना’ में नहीं जोड़ा जाएगा।

फैसला सिर्फ इन चार कर्मचारियों तक सीमित

पीठ ने कहा, यह राहत केवल चार अपीलकर्ताओं तक सीमित है। यह फैसला इस मामले की विशेष परिस्थितियों में दिया गया है और किसी अन्य मामले के लिए नज़ीर (precedent) नहीं माना जाएगा। यह निर्णय उन मामलों में महत्वपूर्ण है जहाँ विज्ञापित पदों से अधिक नियुक्तियों को ‘अनियमित’ मानकर कर्मचारियों को हटा दिया गया हो। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि नियमों में लचीलापन हो और भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी रही हो, तो ऐसी नियुक्तियां अवैध नहीं मानी जा सकतीं।

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CIVIL APPELLATE JURISDICTION
Civil Appeal No. of 2025
[@Special Leave Petition (C) No.14980 of 2024]
Sanjay Kumar Mishra & Ors. Versus District Judge, Ambedkar Nagar (U.P.)

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