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Arbitral award: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी…”निर्णय में लंबी देरी से न्याय व्यवस्था पर भरोसा हिलता है”

Arbitral award: सुप्रीम अदालत ने कहा, पंचाट (arbitral) अवार्ड देने में अनावश्यक देरी कई हानिकारक प्रभाव डालती है; बिना वजह देरी पर संदेह स्वाभाविक।

पंचाट अवार्ड (arbitral award) का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पंचाट अवार्ड (arbitral award) के उच्चारण में अत्यधिक और बिना स्पष्टीकरण के देरी से न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और इससे पक्षकारों के मन में “अनावश्यक संदेह और अटकलें” पैदा होती हैं। न्यायमूर्ति संजय कुमार और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि न्याय व्यवस्था में “पूर्ण विश्वास और भरोसा” ही उसकी आधारशिला है, और यदि यह डगमगाता है, तो पूरी व्यवस्था पर ही आंच आती है।

कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

“अत्यधिक देरी के गंभीर दुष्परिणाम” — अदालत ने कहा कि लम्बे अंतराल में इंसानी स्मृति कमजोर हो जाती है, जिससे गवाहों के बयान और वकीलों के तर्कों का सही आकलन कठिन हो जाता है। “सिर्फ देरी से अवार्ड रद्द नहीं होगा” — अदालत ने कहा कि केवल देरी का होना अवार्ड को निरस्त करने का पर्याप्त आधार नहीं है; हर मामले के तथ्यों को देखकर यह तय किया जाएगा कि क्या देरी से निष्कर्ष पर असर पड़ा है। “बिना वजह की देरी से विश्वास डगमगाता है” — बिना स्पष्टीकरण वाली देरी को अदालत ने “wholly avoidable speculation” कहकर निंदा की।

न्याय की भावना से खिलवाड़ नहीं हो सकता

पीठ ने कहा कि 16 वर्षों बाद पक्षों को दोबारा पंचाट या मुकदमे में भेजना न्याय का उपहास होगा। आर्बिट्रेशन का मूल उद्देश्य समयबद्ध न्याय — अदालत ने कहा कि पंचाट प्रणाली का मकसद त्वरित निपटारा है; इसलिए ऐसी देरी “भारत की सार्वजनिक नीति” के विपरीत मानी जा सकती है।

यह था मामला

पंच (Arbitrator) ने सुनवाई पूरी करने के बाद 28 जुलाई 2012 को अवार्ड सुरक्षित रखा, लेकिन 16 मार्च 2016 को निर्णय सुनाया — लगभग चार साल बाद। न तो इस देरी का कोई कारण बताया गया, न ही विवाद का त्वरित समाधान हुआ। विवाद चेन्नई में एक भवन निर्माण समझौते (Joint Development Agreement) से जुड़ा था, जिसमें निर्माण की समयसीमा और बंटवारे पर मतभेद हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश

अदालत ने अपने अनुच्छेद 142 के विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए न्यायसंगत समाधान निकाला। कंपनी को आदेश दिया गया कि वह तीन माह के भीतर 10 करोड़ रुपये का भुगतान करे। भुगतान के बाद कंपनी को भवन के अपने 50% हिस्से का कब्जा पुनः लेने की अनुमति दी गई। अदालत ने कंपनी द्वारा 19 दिसंबर 2008 को किए गए विक्रय विलेखों को अब वैध और विधिक माना।

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