Rape case: दिल्ली हाईकोर्ट ने दो न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ प्रशासनिक जांच के आदेश दिए हैं।
दुष्कर्म मामले में महिला वकील पर केस कमजाेर करने का दबाव
न्यायमूर्ति अमित महाजन ने कहा, “इस मामले में सामने आई परिस्थितियां इतनी गंभीर हैं कि इस अदालत का विवेक हिल गया है। यह स्पष्ट रूप से न्यायिक प्रक्रिया में दखल का मामला है, इसलिए आरोपी को मिली स्वतंत्रता पर रोक लगाना जरूरी है।”आरोप है कि इन अधिकारियों ने एक महिला वकील पर दबाव डालकर उसके द्वारा दर्ज कराए गए दुष्कर्म मामले को कमजोर करने की कोशिश की।
आरोपी वकील की अग्रिम जमानत रद्द
हाईकोर्ट ने 51 वर्षीय आरोपी वकील की अग्रिम जमानत रद्द करते हुए कहा कि जब न्याय प्रक्रिया में हस्तक्षेप होता है, तो जमानत रद्द की जा सकती है। अदालत ने कहा कि वह यह देखकर स्तब्ध है कि ऐसे मामले में न्यायिक अधिकारी भी शामिल पाए गए हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि भले ही आरोपों की आगे जांच की जाएगी, लेकिन यह पूरा घटनाक्रम आपराधिक न्याय प्रणाली के प्रति घोर असम्मान दिखाता है।
यह है मामला
27 वर्षीय महिला वकील ने शिकायत में कहा कि उसकी मुलाकात आरोपी वकील से एक दोस्त के जरिये हुई थी। एक पार्टी के दौरान आरोपी ने उसके साथ दुष्कर्म किया और बाद में शादी का झांसा देकर संबंध बनाए रखे। महिला ने बताया कि मई में वह गर्भवती भी हो गई। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी के कुछ न्यायिक अधिकारियों से अच्छे संबंध थे और उन्होंने एफआईआर दर्ज होने से पहले और बाद में भी उस पर संपर्क कर दबाव डाला। महिला के वकील ने अदालत में बताया कि एक न्यायिक अधिकारी ने उसे मेडिकल जांच न कराने की सलाह दी और ₹30 लाख का समझौता प्रस्ताव भी दिया। साथ ही कहा गया कि यदि वह बयान में मामला “हल्का” करे तो उसे और मुआवजा दिया जाएगा।
अदालत का आदेश
हाईकोर्ट ने आरोपी को एक हफ्ते में ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा, उन न्यायिक अधिकारियों के आचरण की प्रशासनिक जांच आवश्यक है, जिन्होंने अभियोजन पक्ष की महिला से संपर्क किया। इस संबंध में कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की जाए।अदालत ने टिप्पणी की कि दोनों पक्षों ने न्याय व्यवस्था का “पूर्ण उपहास” किया है और इस तरह की घटनाएं न्याय प्रणाली की साख को ठेस पहुंचाती हैं।

