Monday, June 22, 2026
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Arbitration and Conciliation Act: ग्रुप ऑफ कंपनीज डॉक्ट्र‍िन कोई जादू की छड़ी नहीं…ऐसा क्यों कहा सुप्रीम कोर्ट ने

Arbitration and Conciliation Act: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, विदेशी-सीट (foreign-seated) वाली मध्यस्थता में भारतीय अदालतें किसी भी पक्ष की राष्ट्रीयता या निवास की परवाह किए बिना अरबिट्रेटर नियुक्त नहीं कर सकतीं।

स्टील कंपनी की याचिका खारिज

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने स्टील कंपनी की सेक्शन 11 याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह पूरी तरह कानून के विपरीत और अनुबंध की व्यवस्था को पलटने वाली कोशिश थी।

यह था मामला

बालाजी स्टील ट्रेड ने Arbitration Act की सेक्शन 11(6) के तहत सुप्रीम कोर्ट में एकल मध्यस्थ नियुक्त करने की मांग की थी। विवाद Buyer and Seller Agreement (BSA) और उसके Addendum से जुड़ा था—जिसमें पहले से ही तय था कि मध्यस्थता की सीट (juridical seat) बेनिन होगी और बेनिन का कानून लागू होगा। बाद में छोटे-छोटे Sales Contracts और HSSA Agreements बने, जिनमें अलग-अलग dispute clauses थे। स्टील कंपनी ने इन्हीं का सहारा लेकर विवाद को भारत में खींचने की कोशिश की।

SC का स्पष्ट संदेश — “BSA ही मदर एग्रीमेंट है”

बेंच ने कहा, “BSA और उसका Addendum मुख्य अनुबंध हैं। ये ही विवाद सुलझाने का ढांचा तय करते हैं—सीट बेनिन और कानून भी बेनिन। बाद के कॉन्ट्रैक्ट सिर्फ सप्लाई की सुविधा के लिए थे, इससे BSA की मध्यस्थता व्यवस्था नहीं बदलती।” सुप्रीम कोर्ट ने BALCO, Mankastu, BGS SGS, और PASL Wind Solutions फैसलों का हवाला देते हुए दोबारा दोहराया: “विदेशी सीट वाली मध्यस्थता के लिए भारतीय अदालतें arbitrator नियुक्त नहीं कर सकतीं—पार्टियों की राष्ट्रीयता इसका अपवाद नहीं है।”

स्टील कंपनी की रणनीति अदालत में फेल क्यों हुई?

बेनिन में मध्यस्थ ने पहले ही अंतिम अवॉर्ड दे दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट में दायर anti-arbitration injunction suit भी खारिज हो चुका था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा—स्टील कंपनी इन्हीं मुद्दों को फिर से यहां नहीं उठा सकती।

Group of Companies Doctrine का गलत इस्तेमाल

कंपनी ने तर्क दिया कि कई संबंधित कंपनियों को भी मध्यस्थता में शामिल किया जाना चाहिए था। बेंच ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा, “ग्रुप ऑफ कंपनीज डॉक्ट्र‍िन कोई जादू की छड़ी नहीं है कि हर समूह कंपनी को स्वतः मध्यस्थता में खींच लिया जाए।”सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Part I (भारतीय मध्यस्थता कानून का घरेलू हिस्सा) इस मामले में लागू ही नहीं होता, भारतीय अदालतें arbitrator नियुक्त नहीं कर सकतीं, याचिका कानूनी रूप से गलत है और इसका कोई आधार नहीं, और अंत में याचिका खारिज कर दी।

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CIVIL ORIGINAL JURISDICTION
ARBITRATION PETITION NO. 65 OF 2023
BALAJI STEEL TRADE VERSUS FLUDOR BENIN S.A. & ORS.

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