NEET Cut-off : सुप्रीम कोर्ट ने कहा, वह इस बात की बारीकी से जांच करेगा कि NEET-PG 2025-26 के क्वालिफाइंग मार्क्स (कट-ऑफ) में की गई भारी कटौती का पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा के स्तर पर क्या असर पड़ेगा।
यह रही कोर्ट की मुख्य चिंता
- क्वालिटी से समझौता नहीं: जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा, “हमें सबसे ज्यादा चिंता शिक्षा की गुणवत्ता (Quality of Education) को लेकर है। आपको हमें संतुष्ट करना होगा कि इतनी भारी कटौती का शिक्षा के स्तर पर असर नहीं पड़ेगा।”
- MBBS vs PG: कोर्ट ने माना कि पीजी छात्र पहले से ही डॉक्टर होते हैं, इसलिए यह MBBS में प्रवेश जैसा नहीं है, फिर भी कट-ऑफ के प्रभाव पर विचार करना जरूरी है।
केंद्र सरकार की दलीलें
- सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने निम्नलिखित तर्क दिए।
- सीटें खाली रहना: राउंड-2 की काउंसलिंग के बाद ऑल इंडिया कोटा में 9,621 सीटें खाली थीं, जिनमें से 5,213 सरकारी कॉलेजों में थीं। इसी ‘सीट बर्बादी’ को रोकने के लिए कट-ऑफ घटाया गया।
- न्यूनतम योग्यता: NEET-PG केवल उपलब्ध सीटों के लिए मेरिट लिस्ट बनाने का जरिया है। उम्मीदवार पहले ही MBBS डिग्री लेकर अपनी क्लीनिकल योग्यता साबित कर चुके हैं।
- इतिहास: 2017 से ऐसा होता आया है। साल 2023 में तो कट-ऑफ घटाकर ‘जीरो’ तक कर दिया गया था।
विवाद का मुख्य बिंदु
- याचिकाकर्ताओं ने 13 जनवरी के उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसके तहत जनरल कैटेगरी के लिए कट-ऑफ को 50वें परसेंटाइल से घटाकर सीधे 7वें परसेंटाइल कर दिया गया।
- दावा: इससे करीब 95,913 नए उम्मीदवार काउंसलिंग के लिए पात्र हो गए हैं।
- याचिकाकर्ताओं का तर्क: यह कटौती संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 24 मार्च को तय की है। तब तक केंद्र को कोर्ट को यह भरोसा दिलाना होगा कि इस फैसले से भविष्य के विशेषज्ञ डॉक्टरों की गुणवत्ता प्रभावित नहीं होगी।

