Enrolment Transfer: सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्य बार काउंसिलों के फीस लेने की चुनौती देनेवाली याचिका पर सीधे सुनवाई से इंकार कर दिया।
उच्च न्यायालय को मामले में सुनवाई में तेजी लाने का अनुरोध
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि ऐसा ही एक समान मामला पहले से ही दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) के समक्ष लंबित है। इसलिए, शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को दिल्ली हाई कोर्ट जाने की स्वतंत्रता (Liberty) देते हुए, उच्च न्यायालय से इस मामले की सुनवाई में तेजी लाने (Expedite the Hearing) का अनुरोध किया है। वकीलों के एक राज्य से दूसरे राज्य में पंजीकरण स्थानांतरण (Enrolment Transfer) के लिए ली जाने वाली कथित तौर पर अत्यधिक फीस (Exorbitant Fees) को चुनौती दी थी।
मामला क्या है? (The Dispute Over Transfer Fees)
- यह याचिका एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रैक्टिस ट्रांसफर करने वाले वकीलों से बार काउंसिलों द्वारा वसूली जाने वाली भारी-भरकम ट्रांसफर फीस के खिलाफ दायर की गई थी।
- याचिकाकर्ता का तर्क: याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने अदालत को बताया कि कानूनन राज्यों के बीच ट्रांसफर के लिए इतनी बड़ी रकम वसूलने का कोई प्रावधान नहीं है। उदाहरण के तौर पर, याचिकाकर्ता को दिल्ली से उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में ट्रांसफर के लिए 18,000 रुपये का भुगतान करने के लिए मजबूर किया गया।
- अधिवक्ता अधिनियम (Advocates Act): सीनियर एडवोकेट ने एडवोकेट एक्ट की धारा 18 का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून ट्रांसफर के लिए किसी भी प्रकार की अतिरिक्त फीस की परिकल्पना नहीं करता है। उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा, “हमें बीसीआई के खिलाफ बार-बार कोर्ट आना पड़ रहा है। बीसीआई के खिलाफ कुछ गंभीर विसंगतियां हैं जिन्हें देखा जाना जरूरी है।”
- यूपी बार काउंसिल का पेंच: जब याचिकाकर्ता ने पहले दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था, तब उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि उत्तर प्रदेश बार काउंसिल भी इसके लिए अलग से इतनी भारी फीस वसूल करेगी। चूंकि इसमें यूपी और दिल्ली दोनों बार काउंसिल का अधिकार क्षेत्र शामिल था, इसलिए उन्होंने सीधे सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर की।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीसीआई (BCI) के खिलाफ हर एक मामले को सीधे शीर्ष अदालत में नहीं लाया जा सकता। चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने टिप्पणी की और कहा, हर दिन हम जनहित याचिकाएं (PIL) स्वीकार करते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि बीसीआई के खिलाफ हर कार्रवाई सीधे सुप्रीम कोर्ट में आनी चाहिए। अगर हम इस जनहित याचिका पर सीधे सुनवाई करेंगे, तो ऐसा प्रभावित हर व्यक्ति सीधे यहीं आ जाएगा। सीजेआई ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता दिल्ली हाई कोर्ट में चल रही अपनी मौजूदा याचिका में ही उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को भी एक पक्ष (Implead) के रूप में शामिल कर सकते हैं, क्योंकि वहां उनके खिलाफ एक नया ‘कॉज़ ऑफ एक्शन’ (Fresh Cause of Action) यानी नया विवाद पैदा हुआ है।
पूर्व ऐतिहासिक फैसलों का हवाला (Legal Precedents)
- याचिका में सुप्रीम कोर्ट के ही एक पुराने ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया गया था।
- गौरव कुमार बनाम भारत संघ (2024): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर व्यवस्था दी थी कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) केवल उतनी ही नामांकन फीस (Enrollment Fee) ले सकती है जितनी कानून (Advocates Act) में तय है। कोर्ट ने वकीलों के लिए नामांकन शुल्क को सीमित कर 750 रुपये तय कर दिया था।
- अन्य हाई कोर्टों का रुख: इस फैसले के बाद, बॉम्बे हाई कोर्ट, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट और कई अन्य उच्च न्यायालयों ने भी विभिन्न राज्य बार काउंसिलों द्वारा ली जाने वाली भारी-भरकम ट्रांसफर फीस को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश दिए। इसमें याचिकाकर्ता दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित अपनी रिट याचिका को आगे बढ़ा सकते हैं। यदि वे चाहें, तो उस याचिका में उत्तर प्रदेश बार काउंसिल या अन्य संबंधित राज्य बार काउंसिलों को भी नया पक्षकार बना सकते हैं। दिल्ली हाई कोर्ट से विशेष अनुरोध: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट से आग्रह किया है कि वकीलों के हितों से जुड़े इस महत्वपूर्ण मामले (स्थानांतरण शुल्क विवाद) का अंतिम निपटारा तेजी से और जल्द से जल्द (Expedite final disposal) किया जाए।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| सुप्रीम कोर्ट बेंच | सीजेआई सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली |
| मुख्य मुद्दा | राज्य बार काउंसिलों द्वारा ली जाने वाली अत्यधिक ट्रांसफर फीस (जैसे दिल्ली से यूपी के लिए ₹18,000)। |
| विधिक संदर्भ | एडवोकेट्स एक्ट की धारा 18 और गौरव कुमार केस (2024) का फैसला। |
| कोर्ट का निर्देश | मामला दिल्ली हाई कोर्ट ट्रांसफर; हाई कोर्ट को जल्द सुनवाई पूरी करने का निर्देश। |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह आदेश दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट न्यायपालिका के पदानुक्रम (Judicial Hierarchy) को बनाए रखना चाहता है, ताकि सीधे शीर्ष अदालत पर मुकदमों का बोझ न बढ़े। हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट को सुनवाई तेज करने का निर्देश देकर सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि युवा और अभ्यास करने वाले वकीलों से बार काउंसिलों द्वारा मनमानी फीस वसूलने का मुद्दा गंभीर है। गौरव कुमार (2024) के फैसले के आलोक में, पूरी संभावना है कि दिल्ली हाई कोर्ट भी जल्द ही इस अत्यधिक ट्रांसफर फीस पर रोक लगाने या इसे तर्कसंगत बनाने का आदेश पारित करेगा।

