Sunday, August 30, 2026
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Pecuniary Jurisdiction: दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की याचिका कानूनन विचारणीय नहीं है…हाईकोर्ट के प्रशासनिक पक्ष का यह निर्देश पढ़ें

Pecuniary Jurisdiction: दिल्ली हाई कोर्ट के प्रशासनिक पक्ष ने कार्यवाहक पीठ के समक्ष स्पष्ट किया है कि जिला अदालतों के आर्थिक अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के लिए गठित जजों की समिति के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका कानूनन विचारणीय नहीं है।

हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने इस दलील को रिकॉर्ड पर लेते हुए हाई कोर्ट प्रशासन को निर्देश दिया है कि वे अपनी इस विधिक आपत्ति (Objections to Maintainability) को एक विस्तृत नोट के रूप में अदालत के समक्ष पेश करें। मामले की अगली सुनवाई अब 1 जून 2026 को तय की गई है।

क्या है मुख्य विवाद? (The Jurisdiction & Rs 20 Crore Dispute)

विवाद: यह पूरा विवाद दिल्ली की जिला अदालतों (District Courts) द्वारा सुने जाने वाले दीवानी मामलों (Civil Suits) की वित्तीय सीमा यानी आर्थिक अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के प्रस्ताव से जुड़ा है।

क्या है प्रस्ताव?: दिल्ली की सभी जिला अदालतों की बार एसोसिएशनों की समन्वय समिति (Coordination Committee) ने मई 2025 में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र लिखकर मांग की थी कि जिला अदालतों का आर्थिक अधिकार क्षेत्र वर्तमान ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹20 करोड़ किया जाए।

हाई कोर्ट का कदम (सितंबर 2025): दिल्ली हाई कोर्ट के फुल कोर्ट (Full Court) ने इस मांग का संज्ञान लेते हुए विभिन्न हितधारकों (Stakeholders) से बात करने और सिफारिशें देने के लिए छह जजों की एक समिति का गठन किया।

समिति के सदस्य: वर्तमान में इस न्यायाधीशों की समिति में जस्टिस वी. कामेश्वर राव, जस्टिस एन. डब्ल्यू. सांब्रे, जस्टिस दिनेश मेहता, जस्टिस विवेक चौधरी, जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस नवीन चावला शामिल हैं।

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DHCBA के विरोध का आधार क्या है?

दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) इस आर्थिक अधिकार क्षेत्र को बढ़ाए जाने के कदम का लगातार विरोध कर रही है। उनका तर्क है कि यदि जिला अदालतों का दायरा ₹20 करोड़ तक बढ़ा दिया गया, तो हाई कोर्ट के मूल दीवानी क्षेत्राधिकार (Original Civil Jurisdiction) के तहत आने वाले अधिकांश मामले जिला अदालतों में स्थानांतरित हो जाएंगे।

DHCBA की याचिका में उठाई गई तकनीकी आपत्तियां

संज्ञान का आधार गलत: समन्वय समिति ने अपना पत्र केंद्रीय कानून मंत्रालय को लिखा था, न कि दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को। जब कानून मंत्रालय ने इस पर हाई कोर्ट से कोई टिप्पणी नहीं मांगी, तो फुल कोर्ट ने स्वतः इस पर संज्ञान लेकर जजों की कमेटी क्यों बनाई?

कारणों का अभाव: हाई कोर्ट प्रशासन ने इस बात का कोई स्पष्ट कारण या औचित्य नहीं दिया है कि आखिर इस समिति के गठन की क्या आवश्यकता थी।

अदालत की कार्यवाही और पक्षकारों का रुख

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट प्रशासन की ओर से पेश अधिवक्ता अमित जॉर्ज ने याचिका की विचारणीयता पर कड़ा ऐतराज जताया और कहा कि प्रशासनिक फैसलों या आंतरिक समितियों के गठन के खिलाफ इस तरह की याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं होतीं। दूसरी ओर, जिला अदालतों की समन्वय समिति के वकील ने भी DHCBA की याचिका का विरोध किया। चूंकि DHCBA ने अपनी याचिका में जिला बार एसोसिएशनों को पक्षकार (Party) नहीं बनाया था, इसलिए खंडपीठ ने समन्वय समिति को निर्देश दिया कि वे इस मामले में औपचारिक रूप से शामिल होने के लिए इम्प्लीडमेंट एप्लिकेशन (Impleadment Application) दायर करें।

केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)

कानूनी पैरामीटरविवरण
माननीय उच्च न्यायालय बेंचजस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस तेजस कारिया (दिल्ली हाई कोर्ट)
याचिकाकर्तादिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA)
विवाद का विषयजिला अदालतों का आर्थिक अधिकार क्षेत्र ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹20 करोड़ करने के लिए जजों की समिति का गठन।
हाई कोर्ट प्रशासन का पक्षजजों की इस आंतरिक समिति के खिलाफ DHCBA की याचिका ‘पोषणीय’ (Maintainable) नहीं है।
अगली विधिक प्रक्रियाहाई कोर्ट प्रशासन लिखित आपत्ति नोट दाखिल करेगा; अगली सुनवाई 1 जून 2026 को।

निष्कर्ष (Takeaway)

यह कानूनी लड़ाई दिल्ली के न्यायिक परिदृश्य में ‘हाई कोर्ट बनाम जिला अदालत’ के वकीलों के बीच कार्यक्षेत्र और मुकदमों के बंटवारे के पुराने विवाद को दर्शाती है। यदि ₹20 करोड़ तक के दीवानी मुकदमों की सुनवाई का अधिकार जिला अदालतों को मिल जाता है, तो इससे कड़कड़डूमा, तीस हजारी और साकेत जैसे जिला न्यायालयों के वकीलों का काम अत्यधिक बढ़ जाएगा, जिसका सीधा असर हाई कोर्ट के दीवानी मुकदमों की संख्या पर पड़ेगा। अब 1 जून 2026 को अदालत यह तय करेगी कि क्या बार एसोसिएशन को हाई कोर्ट के इस प्रशासनिक फैसले को चुनौती देने का विधिक अधिकार है या नहीं।

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