Election NOTA: सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों में NOTA (None of the Above) के विकल्प पर एक बड़ा सवाल खड़ा किया।
कोर्ट ने पूछा कि क्या NOTA के प्रावधान से वास्तव में चुने जाने वाले नेताओं की गुणवत्ता (Quality) में कोई सुधार आया है?
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
- सीट नहीं भर सकता NOTA: चीफ जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि NOTA कभी भी ‘उम्मीदवार’ की जगह नहीं ले सकता। भले ही NOTA को सबसे ज्यादा वोट मिलें, लेकिन यह किसी खाली सीट को नहीं भर सकता।
- अनिवार्य मतदान की वकालत: बेंच ने सुझाव दिया कि चुनाव में अच्छे उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए ‘अनिवार्य मतदान’ (Compulsory Voting) की दिशा में प्रयास होने चाहिए।
- शिक्षित मतदाताओं पर तंज: कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि अनपढ़ और महिलाओं की तुलना में शिक्षित और संपन्न लोग वोट डालने में काफी पीछे रहते हैं।
याचिका का मुख्य मुद्दा क्या है?
एक लीगल थिंक-टैंक ‘विधी’ ने जनप्रतिनिधित्व कानून (Representation of the People Act) की धारा 53(2) को चुनौती दी है।
चुनौती की वजह
- एकल उम्मीदवार (Lone Candidate): वर्तमान कानून के अनुसार, अगर किसी सीट पर केवल एक ही उम्मीदवार खड़ा है, तो उसे निर्विरोध विजेता घोषित कर दिया जाता है।
-वोटरों का हक: याचिका में कहा गया है कि ऐसी स्थिति में वोटरों को NOTA का बटन दबाने का मौका नहीं मिलता। 1952 से अब तक लगभग 82 लाख वोटर इस कारण अपना वोट नहीं डाल पाए हैं।
-मांग: याचिकाकर्ता चाहते हैं कि भले ही उम्मीदवार एक हो, लेकिन चुनाव होना चाहिए ताकि जनता अपना विरोध (NOTA) दर्ज करा सके।
सरकार का रुख और कानूनी पक्ष
- अटॉर्नी जनरल की दलील: आर. वेंकटरमणी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि हम काल्पनिक आधारों पर कानून की परीक्षा नहीं ले सकते।
- पुरानी नजीर: 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने ही ऐतिहासिक फैसले के बाद EVM में NOTA का विकल्प जोड़ा था, ताकि नागरिक अपनी अभिव्यक्ति की आजादी (Article 19) का इस्तेमाल कर सकें।
अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट इस बात की जांच करेगा कि क्या धारा 53(2) असंवैधानिक है। इस मामले की अगली सुनवाई 17 मार्च को होगी।

