Sunday, May 24, 2026
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BSF Court Martial: कोर्ट मार्शल कार्यवाही में अंतिम आदेश आना बांकी…BSF अधिकारी पर POSH मामले में यह रही हाईकोर्ट की राय

BSF Court Martial: दिल्ली हाई कोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक अधिकारी की याचिका को खारिज करते हुए सैन्य कानूनी प्रक्रिया में हस्तक्षेप पर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की बेंच ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें इंटरनल कंप्लेंट कमेटी (ICC) के पुनर्गठन और उसकी रिपोर्ट को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि जब तक ‘कोर्ट मार्शल’ (Court Martial) की कार्यवाही में अंतिम आदेश पारित नहीं हो जाता, तब तक हाई कोर्ट द्वारा रिट याचिका (Writ Petition) के माध्यम से हस्तक्षेप करना अनुचित और समय पूर्व (Premature) है।

मामला क्या था? (The Conflict at the Border)

  • घटना: याचिकाकर्ता (BSF सब-इंस्पेक्टर) का दावा है कि दिसंबर 2024 में घने कोहरे के दौरान ड्यूटी में लापरवाही बरतने पर उसने एक महिला प्रहरी (Sentry) को फटकार लगाई थी।
  • शिकायत: इस घटना के दो दिन बाद महिला कर्मी ने अधिकारी के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई।
  • ICC की जांच: पहले एक कमेटी बनी जिसे नियमों के उल्लंघन (अध्यक्ष पुरुष होने के कारण) पर रद्द कर दिया गया। नई गठित ICC ने अधिकारी को कदाचार (Misconduct) का दोषी पाया और अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की। इसके बाद जनरल सिक्योरिटी फोर्स कोर्ट (GSFC) की कार्यवाही शुरू हुई।

कोर्ट का तर्क: “प्रक्रिया पूरी होने दें”

  • हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज करने के लिए कुछ कानूनी आधार बताए।
  • अंतिम आदेश का अभाव: कोर्ट ने कहा कि जब तक कोर्ट मार्शल की कार्यवाही का अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक हाई कोर्ट को रिट के जरिए दखल नहीं देना चाहिए।
  • विकल्प मौजूद हैं: याचिकाकर्ता ने पहले ही ‘प्री-कंफर्मेशन’ (Pre-confirmation) याचिका दायर कर रखी है, जो संबंधित अथॉरिटी के पास लंबित है। इसके बाद भी ‘पोस्ट-कंफर्मेशन’ (Post-confirmation) का कानूनी विकल्प मौजूद रहता है।
  • परिपक्वता की कमी: कोर्ट ने माना कि जब मामला अभी विभाग के भीतर ही विचाराधीन है, तो सीधे हाई कोर्ट आना ‘प्री-मैच्योर’ कदम है।

POSH एक्ट और ICC का गठन

  • याचिकाकर्ता ने ICC के गठन पर भी सवाल उठाए थे।
  • तर्क: कमेटी में चार के बजाय केवल तीन सदस्य थे और उन्हें कानूनी अनुभव नहीं था।
  • कोर्ट का रुख: बेंच ने कहा कि इन सभी दलीलों पर ‘प्री-कंफर्मेशन’ अथॉरिटी विचार करेगी और एक ‘रीज़न्ड ऑर्डर’ (Reasoned Order) पारित करेगी।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विषयअदालत का स्टैंड
क्षेत्राधिकारकोर्ट मार्शल के दौरान हाई कोर्ट का हस्तक्षेप ‘अनिवार्य’ नहीं है।
BSF नियमरूल 117(2) के तहत पुष्टि के बाद भी उपचार (Remedy) उपलब्ध है।
POSH एक्टICC की रिपोर्ट और GSFC के आदेश की समीक्षा विभागीय स्तर पर होनी चाहिए।

निष्कर्ष: सैन्य अनुशासन और कानूनी संयम

यह फैसला सैन्य बलों में अनुशासन बनाए रखने के लिए विभागीय जांच और कोर्ट मार्शल की स्वायत्तता को पुष्ट करता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सैन्य कर्मियों को हाई कोर्ट आने से पहले विभाग के भीतर मौजूद सभी कानूनी रास्तों (Confirmatory remedies) का उपयोग करना अनिवार्य है।

IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI
CORAM:HON’BLE MR. JUSTICE V. KAMESWAR RAO
HON’BLE MS. JUSTICE MANMEET PRITAM SINGH ARORA

W.P.(C) 3064/2026 CM APPL. 14864/2026
AJIT KUMAR SINGH THROUGH SMT. POONAM SINGH
WIFE AND PAIROKAR
versus
UNION OF INDIA AND ORS

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