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Equality in Promotion: एक को छूट, दूसरे को नहीं… यह मनमानी नहीं चलेगी, पदोन्नति में भेदभाव को बताया असंवैधानिक

Equality in Promotion: सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी सेवा में पदोन्नति (Promotion) और समानता के अधिकार पर एक बड़ा फैसला सुनाया।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया जिसने एक कर्मचारी की पदोन्नति पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब नियम छूट की अनुमति देते हैं, तो समान परिस्थितियों वाले सभी कर्मचारी समान व्यवहार के हकदार हैं। कहा है कि यदि नियम ‘योग्यता में छूट’ (Relaxation) की अनुमति देते हैं, तो प्रशासन कुछ कर्मचारियों को यह छूट देकर दूसरों को इससे वंचित नहीं कर सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का सीधा उल्लंघन है।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
मुख्य मुद्दाप्रमोशन के लिए शैक्षणिक योग्यता में छूट।
रजिस्ट्रार की गलतीसमान स्थिति वाले कर्मचारियों के बीच भेदभाव किया।
हाई कोर्ट की टिप्पणीसिंगल जज का राहत देने वाला फैसला सही था, जिसे डिवीजन बेंच ने गलत तरीके से पलट दिया था।
नतीजासुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की पदोन्नति का रास्ता साफ कर दिया।

मामला क्या था? (The Background)

  • कर्मचारी: अपीलकर्ता 1987 से एक सहकारी संस्था (Cooperative Society) में काम कर रहा था। उसके पास 28 साल का लंबा अनुभव और साफ सुथरा रिकॉर्ड था।
  • नियमों में बदलाव: 2013 में नए नियम आए, जिसमें पदोन्नति के लिए ‘ग्रेजुएशन’ अनिवार्य कर दिया गया। हालांकि, नियमों में यह प्रावधान (Proviso) भी था कि अनुभव और वरिष्ठता के आधार पर योग्यता में छूट दी जा सकती है।
  • विवाद: संस्था के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने अपीलकर्ता को छूट देने की सिफारिश की, लेकिन रजिस्ट्रार ने इसे बिना कारण बताए खारिज कर दिया। वहीं, दो अन्य कर्मचारियों (जिनके पास समान योग्यता थी) को रजिस्ट्रार ने छूट देकर प्रमोट कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट का संवैधानिक तर्क (Articles 14 & 16)

  • सुप्रीम अदालत ने रजिस्ट्रार और हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के रवैये की आलोचना की।
  • समानता का सिद्धांत: संविधान का अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और 16 (सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता) यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रशासन मनमानी न करे।
  • भेदभावपूर्ण व्यवहार: जब दो अन्य ‘हायर सेकेंडरी’ पास कर्मचारियों को प्रमोट किया गया, तो तीसरे व्यक्ति को उसी आधार पर रोकना पूरी तरह से मनमाना (Arbitrary) है।
  • असली न्याय: कोर्ट ने कहा कि “वास्तविक न्याय तभी होता है जब समानता के सिद्धांत को लागू किया जाए।”

नकारात्मक समानता (Negative Equality) का तर्क खारिज

  • अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट किया। अक्सर प्रशासन यह तर्क देता है कि यदि एक गलत काम (अयोग्य को प्रमोट करना) हुआ है, तो दूसरे को भी वही गलत लाभ नहीं दिया जा सकता (इसे ‘Negative Equality’ कहते हैं)।
  • सुप्रीम कोर्ट का जवाब: यहाँ यह मामला नहीं था। नियम खुद छूट देने की शक्ति देते थे। इसलिए, अपीलकर्ता कोई ‘अवैध लाभ’ नहीं मांग रहा था, बल्कि वह उस ‘कानूनी छूट’ का हकदार था जो दूसरों को दी गई थी।

कर्मचारी के स्वाभिमान की जीत

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन अधिकारियों के लिए चेतावनी है जो अपनी शक्तियों का उपयोग ‘पिक एंड चूज’ (अपनी पसंद के लोगों को लाभ देना) के लिए करते हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि प्रशासनिक शक्तियाँ ‘विवेक’ (Discretion) पर आधारित हो सकती हैं, लेकिन ‘भेदभाव’ पर नहीं। यदि नियम रियायत की जगह देते हैं, तो वह रियायत सभी पात्र उम्मीदवारों को मिलनी चाहिए।

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