RTI vs LIC: दिल्ली हाई कोर्ट ने RTI (सूचना का अधिकार) के तहत बीमा पॉलिसियों की जानकारी प्राप्त करने की प्रक्रिया को अधिक सुलभ और नागरिक-केंद्रित बनाने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें LIC को निर्देश दिया गया था कि वे केवल ‘पॉलिसी नंबर’ की कमी के आधार पर जानकारी देने से मना न करें। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति के पास अपनी पॉलिसी संख्या (Policy Number) नहीं है, तब भी वह अपनी बुनियादी जानकारी देकर LIC से जानकारी प्राप्त कर सकता है।
फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| मुख्य निर्णय | पॉलिसी नंबर के बिना भी RTI के तहत जानकारी प्राप्त की जा सकती है। |
| शर्त | आवेदक को अपनी पहचान साबित करने वाली बुनियादी जानकारी देनी होगी। |
| LIC की चुनौती | 27 करोड़ पॉलिसियों के विशाल डेटाबेस को व्यवस्थित रूप से सर्च करना। |
| नतीजा | अपील खारिज कर दी गई; सिंगल जज का राहत देने वाला आदेश बरकरार। |
मामला क्या था? (The Dispute)
- आवेदक की मांग: एक महिला ने RTI के तहत LIC से उन सभी पॉलिसियों की सूची मांगी थी, जिनमें उसे बीमित व्यक्ति (Insured Party) बनाया गया था।
- LIC का इनकार: LIC (CPIO) ने यह कहते हुए जानकारी देने से मना कर दिया कि उनका पूरा सिस्टम ‘पॉलिसी नंबर’ पर आधारित है और इसके बिना डेटा खोजना ‘असंभव’ है।
- केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) का रुख: CIC ने LIC को अपना सिस्टम सुधारने और पॉलिसी नंबर के बिना भी डेटा खोजने का तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया था।
कोर्ट का समाधान: पॉलिसी नंबर नहीं तो ये ‘7 डिटेल्स’ दें
अदालत ने माना कि LIC के पास लगभग 27 करोड़ पॉलिसियां हैं, इसलिए बिना किसी पहचान के डेटा खोजना मुश्किल है। लेकिन, कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी को उसकी जानकारी के बिना बीमित किया गया है, तो उसके पास पॉलिसी नंबर नहीं होगा।
अब आवेदक निम्नलिखित विवरण देकर जानकारी मांग सकता है
- बीमित व्यक्ति का नाम
- जन्म तिथि (Date of Birth)
- लिंग (Gender)
- पता और पिन कोड
- मोबाइल नंबर
- ईमेल आईडी
- बैंक खाता संख्या (NEFT के लिए पंजीकृत)
कानूनी स्पष्टीकरण: RTI एक्ट की धारा 23 और रिट याचिका
- अपीलकर्ता ने तर्क दिया था कि RTI एक्ट की धारा 23 के तहत सिंगल जज को CIC के आदेश के खिलाफ याचिका नहीं सुननी चाहिए थी। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए स्पष्ट किया।
- संवैधानिक शक्ति: RTI एक्ट की धारा 23 निचली अदालतों को सूट या आवेदन सुनने से रोकती है, लेकिन यह हाई कोर्ट की अनुच्छेद 226 के तहत मिलने वाली ‘रिट क्षेत्राधिकार’ (Writ Jurisdiction) की शक्ति को कम नहीं कर सकती। यह संविधान का मूल ढांचा (Basic Feature) है।
पारदर्शिता और जवाबदेही
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए बड़ी राहत है जो अपनी पुरानी पॉलिसियों का रिकॉर्ड खो चुके हैं या जिन्हें संदेह है कि उनके नाम पर गुप्त रूप से बीमा लिया गया है। कोर्ट ने तकनीक और मानवीय जरूरतों के बीच संतुलन बनाते हुए यह साफ कर दिया कि “डेटा की अधिकता” सूचना के अधिकार को दबाने का बहाना नहीं बन सकती।

