Prison Undertrials: दिल्ली हाई कोर्ट ने राजधानी की सभी जिला अदालतों, जेल अधिकारियों और कानूनी सेवा प्राधिकरणों (DLSA) को सख्त निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस गिरीश कठपालिया ने ‘ऋषभ गहलोत बनाम राज्य’ मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि कई कैदी अपनी अधिकतम सजा के एक-तिहाई से भी ज्यादा समय जेलों में बिता रहे हैं, जो उनके अधिकारों का उल्लंघन है। कहा कि वे उन विचाराधीन कैदियों (Undertrials) की रिहाई सुनिश्चित करें, जो अपनी अधिकतम संभावित सजा का एक-तिहाई (1/3rd) हिस्सा जेल में काट चुके हैं।
BNSS की धारा 479 और सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
- अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की नई धारा 479 का हवाला दिया।
- नियम: यदि कोई व्यक्ति पहली बार अपराधी (First-time offender) है और उसने उस अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम सजा का एक-तिहाई (1/3rd) हिस्सा हिरासत में बिता लिया है, तो वह अदालत द्वारा व्यक्तिगत मुचलके पर रिहा होने का पात्र है।
- संदर्भ: हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘In Re: 1382 जेलों में अमानवीय स्थितियां’ का सख्ती से पालन करने को कहा है।
मामला क्या था? (The Case of Rishabh Gehlot)
- आरोप: ऋषभ पर एक मां-बेटी के साथ धोखाधड़ी करने और नाम बदलकर पैसे ठगने का आरोप था।
- स्थिति: इस अपराध के लिए अधिकतम सजा 7 साल है, जिसमें से ऋषभ पहले ही एक-तिहाई से अधिक समय जेल में बिता चुका था।
- जांच पर सवाल: हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की जांच पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी (IO) ने सह-आरोपी की ऑडियो रिकॉर्डिंग को ऋषभ की बताकर अदालत को गुमराह (Mislead) करने की कोशिश की थी।
- पक्षपात: कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि मामले में 5 आरोपी थे, लेकिन केवल ऋषभ को ही गिरफ्तार किया गया, जबकि मुख्य सह-आरोपी (नितिन) अभी भी फरार है।
हाई कोर्ट के कड़े निर्देश
- अदालत ने प्रशासन को ‘लेटर और स्पिरिट’ (Letter and Spirit) में काम करने को कहा है।
- निदेशकों को आदेश: आदेश की कॉपी सभी जिला जजों और तिहाड़ जेल के महानिदेशक (DG Prisons) को भेजी जाए।
- कानूनी सहायता: जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (DLSA) को ऐसे मामलों की पहचान करने और तुरंत कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है ताकि कोई भी पात्र कैदी जेल में न सड़े।
फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| मुख्य लाभार्थी | पहली बार अपराध करने वाले विचाराधीन कैदी (First-time undertrials)। |
| पात्रता | अधिकतम सजा का 1/3 हिस्सा जेल में बिता चुके हों। |
| जांच एजेंसी की आलोचना | अदालत को गुमराह करने और पक्षपाती जांच के लिए पुलिस को फटकार। |
| नतीजा | ऋषभ को जमानत दी गई और पूरे सिस्टम को सुधार के निर्देश दिए गए। |
न्याय में देरी, न्याय का हनन
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला जेलों में भीड़ कम करने और विचाराधीन कैदियों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए एक बड़ा कदम है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि जांच एजेंसियों की लापरवाही या कानूनी प्रक्रियाओं की सुस्ती की वजह से किसी भी व्यक्ति को उसकी कानूनी पात्रता से अधिक समय तक सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता।
IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI
CORAM: JUSTICE GIRISH KATHPALIA
BAIL APPLN. 2071/2025
RISHABH GEHLOT versus STATE (NCT OF DELHI)

