Monday, August 31, 2026
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Games of Skill: मोबाइल पर रम्मी और पोकर जैसे खेलों पर दांव लगा रहे हैं तो संभल जाएं…इसमें पैसा या दांव लगाना भी सट्‌टेबाजी है, पढ़िए क्या है मामला

Games of Skill: सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन गेमिंग, रम्मी और पोकर जैसे खेलों पर दांव लगाने (Betting) को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और युगांतरकारी फैसला सुनाया है।

ऑनलाइन गेमिंग को लेकर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने मद्रास और कर्नाटक हाई कोर्ट के पुराने फैसलों को पलटते हुए तमिलनाडु और कर्नाटक सरकारों द्वारा ऑनलाइन रम्मी और पोकर पर प्रतिबंध लगाने वाले कानूनों को पूरी तरह संवैधानिक (Intra Vires) घोषित किया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कौशल के खेल (Games of Skill) पर भी यदि पैसा या दांव लगाया जाता है, तो वह एक सट्टेबाजी/जुआ व्यवसाय (Gambling Enterprise) बन जाता है। इसे संविधान के तहत किसी भी व्यापार संरक्षण (Protected Trade) का अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य कानूनी सिद्धांत (Core Legal Concepts)

दांव लगते ही खेल का स्वरूप बेअसर: शीर्ष अदालत ने इस फैसले में ‘कौशल के खेल’ (Games of Skill) और ‘सट्टेबाजी’ (Betting) के बीच के अंतर को पूरी तरह स्पष्ट किया। न्यायालय ने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 34 (Entry 34, List II) के तहत ‘कौशल के खेल’ को जो संरक्षण मिला हुआ है, उसे उन खेलों पर ‘सट्टेबाजी’ करने के संरक्षण के रूप में नहीं देखा जा सकता। जैसे ही खेल में मौद्रिक दांव (Monetary Stakes) या पैसा शामिल होता है, खेल का मूल स्वरूप (चाहे वह दिमाग का खेल हो या किस्मत का) अपनी प्रासंगिकता खो देता है।

जुआ कोई मौलिक अधिकार नहीं (Res Extra Commercium): अदालत ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि सट्टेबाजी और जुए के दायरे में आने वाली गतिविधियां ‘रेस एक्स्ट्रा कॉमर्सियम’ (Res Extra Commercium – यानी कानूनन व्यापार के दायरे से बाहर) हैं। चूंकि यह गतिविधि व्यापार के दायरे से ही बाहर है, इसलिए ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत ‘व्यापार करने की स्वतंत्रता’ का कोई मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है। जब कोई मौलिक अधिकार ही मौजूद नहीं है, तो वहां आनुपातिकता के परीक्षण (Test of Proportionality) का सवाल ही नहीं उठता।

‘बैटिंग और गैंबलिंग’ को अलग नहीं किया जा सकता: हाई कोर्ट्स ने अपने फैसले में कहा था कि प्रविष्टि 34 का मतलब केवल “भाग्य के खेल पर सट्टेबाजी” (Betting on Gambling) है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवैधानिक विचलन (Constitutional Aberration) और संविधान को फिर से लिखने जैसा प्रयास बताते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि दोनों ही स्थितियों में अनिश्चित परिणाम पर पैसा दांव पर लगाया जाता है, इसलिए विधायिका को इसे प्रतिबंधित करने का पूरा अधिकार है।

सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) और आत्महत्याओं पर चिंता

सार्वजनिक शांति का हनन: अदालत ने ऑनलाइन गेमिंग के सामाजिक और आर्थिक दुष्प्रभावों पर गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने नोट किया कि ऑनलाइन मनी गेमिंग के कारण समाज में लत (Addiction), भारी वित्तीय नुकसान और इसके परिणामस्वरूप व्यापक स्तर पर आत्महत्याएं (Widespread Suicides) हो रही हैं।

राज्यों की विधायी शक्ति: यह स्थिति सार्वजनिक शांति को भंग करती है। इसलिए, राज्य सरकारें संविधान की सूची II की प्रविष्टि 1 (Public Order) और प्रविष्टि 34 (Betting & Gambling) के तहत इस सामाजिक बुराई को रोकने और सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करने के लिए कानून बनाने के लिए पूरी तरह सक्षम (Competent) हैं। तमिलनाडु सरकार का कानून ‘जस्टिस चंद्रू समिति’ के व्यावहारिक आंकड़ों पर आधारित था।

संविधान सभा की बहसों (Constituent Assembly Debates) का हवाला

फैसले में संविधान के निर्माताओं की मूल भावना को रेखांकित करने के लिए संविधान सभा की बहसों का विस्तृत संदर्भ दिया गया। कहा, संविधान निर्माताओं का यह स्पष्ट दृष्टिकोण था कि यदि ‘रम्मी’ जैसे कौशल के खेल को भी दांव या सट्टे (Stakes) के साथ खेला जाता है, तो राज्य सरकारें प्रविष्टि 34 के तहत उसे विनियमित (Regulate) या पूरी तरह प्रतिबंधित (Prohibit) कर सकती हैं। निर्माताओं की इससे साफ मंशा और कोई नहीं हो सकती।

मामले की पृष्ठभूमि और किन कानूनों को मिली मंजूरी?

विवाद की शुरुआत: तमिलनाडु सरकार ने ‘तमिलनाडु ऑनलाइन जुआ अधिनियम, 2022-23’ और कर्नाटक सरकार ने ‘कर्नाटक पुलिस संशोधन अधिनियम, 2021’ लागू कर ऑनलाइन रम्मी और पोकर जैसे दांव वाले खेलों को प्रतिबंधित कर दिया था।

हाई कोर्ट का रुख: ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों ने इसे चुनौती दी। मद्रास और कर्नाटक हाई कोर्ट ने प्रतिबंधों को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि ये ‘कौशल के खेल’ हैं और इन्हें अनुच्छेद 19(1)(g) का संरक्षण प्राप्त है।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने दोनों हाई कोर्ट के फैसलों को पूरी तरह खारिज (Set Aside) कर दिया और राज्यों की अपीलों को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने इन प्रावधानों को वैध घोषित किया, जिसमें तमिलनाडु ऑनलाइन जुआ अधिनियम 2022/23 की धारा 2(i), 2(l)(iv) और इसकी अनुसूची,
कर्नाटक संशोधन अधिनियम, 2021 की धारा 2, 3, 6, 8 और 9 हैं।

फैसले का मुख्य सार (Core Matrix)

कानूनी बिंदुहाई कोर्ट का पुराना रुखसुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय (2026)
कौशल के खेल (जैसे रम्मी/पोकर)इन्हें मौलिक अधिकार (Article 19(1)(g)) के तहत संरक्षण प्राप्त है।खेल पर दांव लगते ही यह ‘जुआ व्यवसाय’ बन जाता है; कोई संवैधानिक संरक्षण नहीं।
प्रविष्टि 34 (Entry 34, List II)इसका अर्थ केवल “किस्मत के खेल पर सट्टेबाजी” है।इसका दायरा व्यापक है; राज्य सरकारें कौशल के खेल पर भी सट्टेबाजी को प्रतिबंधित कर सकती हैं।
कानूनी दर्जावैध व्यापार माना गया था।Res Extra Commercium (व्यापार और वाणिज्य के दायरे से सर्वथा बाहर)।
सामाजिक प्रभावव्यावसायिक स्वतंत्रता के अधीन।लत, वित्तीय बर्बादी और आत्महत्याओं के कारण ‘सार्वजनिक व्यवस्था और शांति’ का मुद्दा है।

निष्कर्ष (Takeaway)

यह सुप्रीम कोर्ट का ऑनलाइन रियल-मनी गेमिंग इंडस्ट्री पर अब तक का सबसे बड़ा और निर्णायक प्रहार है। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि ‘कौशल के खेल’ का टैग लगाकर सट्टेबाजी या जुए का धंधा नहीं चलाया जा सकता। यह आदेश आने वाले समय में देश के भीतर ऑनलाइन गेमिंग और बेटिंग ऐप्स के नियमन और उन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए सभी राज्य सरकारों का मार्ग पूरी तरह प्रशस्त करता है।

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