Verdict on Mediation: सुप्रीम कोर्ट ने राजेश बिंदल और विजय बिश्नोई की बेंच के माध्यम से वैवाहिक विवादों और मध्यस्थता (Mediation) समझौतों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय दिया है।
आधी राशि प्राप्त करने के बाद पत्नी ने रुख बदला
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले की सुनवाई की जहाँ पत्नी ने 1.5 करोड़ रुपये और अन्य लाभों के समझौते पर हस्ताक्षर करने और आधी राशि प्राप्त करने के बाद अपना रुख बदल लिया था। कोर्ट ने पत्नी की “दुस्साहस” (Audacity) पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी पक्ष आपसी सहमति से तलाक की अर्जी तो वापस ले सकता है, लेकिन वह कोर्ट द्वारा प्रमाणित समझौते (Settlement) की शर्तों से मुकर नहीं सकता।
मामला क्या था? (The Dispute History)
- शादी और समझौता: जोड़े की शादी 2000 में हुई थी। 2023 में तलाक की प्रक्रिया के दौरान मध्यस्थता (Mediation) के जरिए समझौता हुआ।
- शर्तें: पति को 1.5 करोड़ रुपये, कार के लिए 14 लाख रुपये और गहने देने थे। पत्नी को बिजनेस अकाउंट से 2.5 करोड़ रुपये पति को ट्रांसफर करने थे।
- यू-टर्न: पति ने 75 लाख रुपये और कार के पैसे दे दिए, पत्नी ने भी पैसे ट्रांसफर कर दिए। लेकिन अंतिम डिक्री से पहले पत्नी ने सहमति वापस ले ली और पति व सास के खिलाफ घरेलू हिंसा (Domestic Violence Act) का केस दर्ज करा दिया।
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या
- अदालत ने ‘सहमति वापस लेने’ और ‘समझौते से मुकरने’ के बीच का अंतर स्पष्ट किया।
- सहमति वापसी बनाम वादाखिलाफी: कानूनन कोई भी पक्ष तलाक की डिक्री मिलने तक अपनी ‘सहमति’ वापस ले सकता है। लेकिन, यदि विवादों के पूर्ण निपटारे (Full and Final Settlement) के लिए कोई समझौता हुआ है, तो उस समझौते की शर्तों से पीछे हटना गलत है।
- मध्यस्थता की पवित्रता: कोर्ट ने कहा कि एक बार जब मध्यस्थ समझौते को प्रमाणित कर देता है और कोर्ट उसे स्वीकार कर लेता है, तो वह मूल शिकायत की जगह ले लेता है। इसे हल्के में लेना मध्यस्थता प्रक्रिया की बुनियाद पर हमला है।
- भारी जुर्माना (Heavy Costs): जो पक्ष समझौते से मुकर जाए, उस पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए ताकि कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोका जा सके।
पत्नी के दावों पर कोर्ट की ‘फटकार’
- पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि समझौते के अलावा पति ने उसे ₹120 करोड़ के गहने और ₹50 करोड़ के सोने के बिस्कुट देने का मौखिक वादा किया था, जिसे ‘टैक्स’ से बचने के लिए कागजों पर नहीं लिखा गया।
- अदालत की टिप्पणी: बेंच ने कहा, “हम अदालत के सामने इस तरह की दलील देने के दुस्साहस से स्तब्ध हैं। यह कानूनी व्यवस्था के प्रति सरासर अनादर है।”
घरेलू हिंसा (DV Act) केस पर फैसला
- कोर्ट ने पत्नी द्वारा दर्ज कराए गए DV केस को ‘सोची-समझी साजिश’ (Premeditated) और ‘बाद का विचार’ (Afterthought) माना।
- 23 साल की शादी: कोर्ट ने गौर किया कि 23 साल की शादी में पहली बार घरेलू हिंसा का आरोप तब लगाया गया जब पति ने समझौते से मुकरने पर अवमानना (Contempt) याचिका दायर की।
- नतीजा: कोर्ट ने DV एक्ट की कार्यवाही को रद्द (Quash) कर दिया।
अनुच्छेद 142 का प्रयोग और अंतिम आदेश
| बिंदु | विवरण |
| अनुच्छेद 142 | कोर्ट ने माना कि शादी पूरी तरह टूट चुकी है और संविधान की विशेष शक्ति का उपयोग कर तलाक की मंजूरी दी। |
| वित्तीय आदेश | पति को समझौते की शेष राशि पत्नी को देने का निर्देश दिया गया। |
| अपवाद | समझौते से केवल तभी मुकरा जा सकता है जब वह धोखाधड़ी, दबाव या गलत बयानी से किया गया हो। |
मध्यस्थता को मजबूती
यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा सबक है जो मध्यस्थता केंद्रों में समझौते करके बाद में दबाव बनाने के लिए आपराधिक मुकदमे (जैसे 498A या DV Act) दर्ज कराते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि समझौता एक पवित्र कानूनी दस्तावेज है, कोई खेल नहीं।

