Legal Ethics: बॉम्बे हाई कोर्ट ने कानूनी पेशे की मर्यादा और अदालती प्रक्रिया की पवित्रता को बनाए रखने के लिए एक कड़ा रुख अपनाया है।
पक्षकारों के साथ भी छल किया: कोर्ट
हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के जस्टिस अनिल एल. पानसरे और जस्टिस निवेदिता पी. मेहता की खंडपीठ ने वकील एस.डी. चांडे के आचरण को ‘कदाचार’ (Misconduct) करार दिया है। कोर्ट ने माना कि वकील ने न केवल अदालत को अंधेरे में रखा, बल्कि पक्षकारों के साथ भी छल किया। अदालत ने ‘बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र और गोवा’ को एक वकील के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है, जिन्होंने बिना ‘वकालतनामा’ (Vakalatnama) दाखिल किए कई पक्षों का प्रतिनिधित्व किया और अदालत को गुमराह करने की कोशिश की।
मामला क्या था? (The Breach of Trust)
- विवाद: यह मामला एक जमीन विवाद से जुड़ा था, जिसमें याचिकाकर्ता ने अपने लीज वाले प्लॉट से अनधिकृत निर्माण हटाने की मांग की थी।
- वकील की भूमिका: एडवोकेट चांडे प्रतिवादी संख्या 5 से 11 की ओर से पेश हो रहे थे। उनके बयानों के आधार पर कोर्ट ने मार्च और अप्रैल 2026 में दो आदेश भी पारित किए थे।
- पकड़ी गई चूक: बाद में कोर्ट ने पाया कि वकील ने केवल प्रतिवादी संख्या 7 के लिए वकालतनामा दाखिल किया था, लेकिन वह बिना किसी कानूनी अधिकार के प्रतिवादी 5 से 11 तक के सभी पक्षों की ओर से दलीलें दे रहे थे।
कोर्ट का कड़ा रुख: यह केवल गलती नहीं, शरारत है
- अदालत ने वकील के आचरण में कई गंभीर खामियां पाईं।
- गुमराह करने की कोशिश: वकील ने कोर्ट को यह समझाने की कोशिश की कि ट्रायल कोर्ट ने दो अलग-अलग मुकदमों में एक ‘साझा फैसला’ (Common Judgment) सुनाया था, जबकि रिकॉर्ड से साफ था कि फैसले अलग-अलग थे।
- पुराना रिकॉर्ड: कोर्ट ने नोट किया कि यह पहली बार नहीं है जब उक्त वकील का आचरण आपत्तिजनक पाया गया है। पहले भी ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज किया गया था, लेकिन इस बार मामला सीमा पार कर गया।
- कदाचार (Misconduct): बेंच ने स्पष्ट कहा, “श्री चांडे द्वारा खेली गई यह शरारत कदाचार की श्रेणी में आती है। उन्होंने कोर्ट और पक्षकारों को गुमराह किया है।”
‘फोर्जरी’ और ‘अवमानना’ (Contempt of Court)
- यह मामला केवल वकालतनामा न होने तक सीमित नहीं रहा।
- जाली दस्तावेज: कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादियों ने अदालत के सामने ‘जाली दस्तावेजों’ (Forged Documents) के आधार पर धोखाधड़ी करने की कोशिश की है।
- अवमानना नोटिस: कोर्ट ने प्रतिवादियों के खिलाफ ‘स्वत: संज्ञान’ (Suo Motu) लेते हुए अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया है।
फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| मुख्य निर्देश | बार काउंसिल वकील के खिलाफ ‘उपयुक्त कार्रवाई’ (Suitable Action) करे। |
| अवैध निर्माण | नागपुर इंप्रूवमेंट ट्रस्ट (NIT) को 6 हफ्ते में अवैध ढांचा हटाने का आदेश। |
| वकालतनामा की अहमियत | इसके बिना कोर्ट में पक्ष रखना न केवल प्रक्रियात्मक चूक है, बल्कि पेशेवर कदाचार भी है। |
| न्यायिक टिप्पणी | वकील कोर्ट का अधिकारी होता है, उसे तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश नहीं करना चाहिए। |
वकीलों के लिए एक चेतावनी
बॉम्बे हाई कोर्ट का यह आदेश स्पष्ट करता है कि वकालतनामा केवल एक कागज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक वकील को मिलने वाला वह कानूनी अधिकार है जिसके बिना वह किसी का पक्ष नहीं रख सकता। अदालत को गलत जानकारी देना या दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ करना किसी भी वकील के करियर के लिए घातक साबित हो सकता है।

