Wednesday, October 28, 2026
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RTI Breaking: यूपी विस के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे की नियुक्ति और सेवा विस्तार केस…जस्टिस जसप्रीत सिंह सुनवाई से खुद हुए अलग…पढ़िए पूरा मामला

RTI Breaking: उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति और 62 साल की सेवानिवृत्ति उम्र पार करने के बाद भी लगातार पद पर बने रहने को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है।

नियुक्ति को अवैध बताते हुए उन्हें काम करने से रोकने की मांग

यह मामला हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस जसप्रीत सिंह के समक्ष आया, जिन्होंने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग (Recuse) कर लिया। उन्होंने निर्देश दिया कि इस मामले को मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) या संबंधित वरिष्ठ न्यायाधीश के जरिए किसी अन्य बेंच के समक्ष लिस्ट किया जाए। इस याचिका में उनकी नियुक्ति को अवैध बताते हुए उन्हें काम करने से रोकने (Interim Order) की मांग की गई है। यह याचिका उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष (Speaker) के पूर्व सूचना अधिकारी (Information Officer) कर्मेश प्रताप सिंह द्वारा दायर की गई है। याचिका में प्रदीप दुबे के पद पर बने रहने के कानूनी अधिकार (Quo Warranto) पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

क्या हैं प्रदीप दुबे पर लगे आरोप? (याचिका के मुख्य बिंदु)

आरोप: याचिकाकर्ता ने सूचना का अधिकार (RTI) और अन्य दस्तावेजों का हवाला देते हुए प्रमुख सचिव की नियुक्ति और सेवा विस्तार पर कई चौंकाने वाले आरोप लगाए हैं।

उम्र सीमा का उल्लंघन (2009): याचिका में आरोप है कि प्रदीप दुबे की 2009 में हुई नियुक्ति ‘उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय (भर्ती और सेवा शर्तें) नियमावली, 1974 का सीधा उल्लंघन थी। इस नियम के तहत चयन श्रेणी के पदों के लिए अधिकतम उम्र सीमा 52 वर्ष तय थी, जबकि दुबे इस सीमा को पार कर चुके थे।

बिना विज्ञापन और चयन के नियुक्ति: याचिका के अनुसार, प्रदीप दुबे ने 13 जनवरी 2009 को उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ली और उसी दिन उन्हें प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य) नियुक्त कर दिया गया। इसके छह दिन बाद उन्हें विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव का प्रभार दे दिया गया। आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया बिना किसी विज्ञापन, प्रतिस्पर्धी चयन, लोक सेवा आयोग (PSC) से परामर्श या संविधान के अनुच्छेद 187 के तहत जरूरी मंजूरियों के बिना की गई।

पिछली तारीख से नियम बदलने का आरोप: याचिका में दावा किया गया है कि प्रदीप दुबे 30 अप्रैल 2019 को 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हो चुके थे। इसके बाद 17 मार्च 2020 को एक अधिसूचना जारी कर सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाकर 65 वर्ष कर दी गई। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस नियम को पिछली तारीख (Retrospectively) से दुबे पर लागू नहीं किया जा सकता था। वर्तमान में दुबे की उम्र 68 वर्ष से अधिक हो चुकी है, फिर भी वे पद पर बने हुए हैं।

RTI में गायब मिले दस्तावेज: याचिकाकर्ता का दावा है कि RTI के तहत मांगी गई जानकारी में उनकी नियुक्ति, सेवा विस्तार, विभागीय प्रोन्नति समिति (DPC) की सिफारिश या लोक सेवा आयोग से परामर्श का कोई वैध आदेश नहीं मिला। अपीलीय अधिकारियों ने ऑन-रिकॉर्ड माना कि ये दस्तावेज सरकारी फाइलों में उपलब्ध ही नहीं हैं।

वित्तीय अनियमितताओं के आरोप: याचिका में विधानसभा सचिवालय सहकारी समिति से जुड़े करोड़ों रुपये के अवैध लोन और अन्य वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप भी लगाए गए हैं। इसकी शिकायतें राष्ट्रपति सचिवालय, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और राज्यपाल सचिवालय को भी भेजी गई थीं।

याचिका में लगाए गए इन सभी आरोपों पर अभी हाई कोर्ट द्वारा कोई अंतिम फैसला या न्यायिक निर्णय नहीं दिया गया है।

विश्लेषण: विधानसभा सचिवालय और इस केस के कानूनी मायने

इम्पैक्ट एरियाहाई कोर्ट का स्टैंड और इसका असर
रीप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी (Reproductive Autonomy)कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि खुद की संतान पैदा करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life) के तहत एक मौलिक अधिकार है, जिसे सरकारी नियमों की तकनीकी कमियों से दबाया नहीं जा सकता।
IVF सेंटर्स और अस्पतालों के लिए राहतइस फैसले के बाद अस्पतालों और डॉक्टरों को एक कानूनी स्पष्टता मिलेगी। अगर इलाज के दौरान मरीज की उम्र सीमा पार हो जाती है, तो वे पेंडिंग भ्रूणों के इस्तेमाल के लिए मरीजों को परेशान नहीं करेंगे।
मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकताकोर्ट ने पीड़ित माता-पिता के मानसिक दर्द (बेटे को खोने का गम) को समझा। यह फैसला साबित करता है कि न्यायपालिका केवल कागजी नियमों पर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं (Humanitarian Ground) पर भी चलती है।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

उत्तर प्रदेश विधानसभा के सबसे बड़े प्रशासनिक पद को लेकर दायर यह याचिका बेहद संवेदनशील है। हालांकि, जस्टिस जसप्रीत सिंह के सुनवाई से हटने के बाद अब चीफ जस्टिस द्वारा नामित नई बेंच ही यह तय करेगी कि प्रदीप दुबे को पद पर काम करने से रोका जाए या नहीं। संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों की पारदर्शिता हमेशा कानून के शासन की कसौटी होती है, और यह केस ब्यूरोक्रेसी के नियमों की एक बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है।

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