Wednesday, July 22, 2026
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Bigamy vs. Relationship: सिर्फ साथ रहना शादी नहीं…और इस तरह 73 वर्षीय एक बुजुर्ग के खिलाफ द्विविवाह का केस रद्द, जानें फैसला

Bigamy vs. Relationship: कर्नाटक हाई कोर्ट ने द्विविवाह (Bigamy) के कानून पर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए 73 वर्षीय व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द कर दिया है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
धारा (IPC 494)पति/पत्नी के जीवनकाल में दूसरी शादी करना।
सजा7 साल तक की जेल और जुर्माना।
कोर्ट का रुखशिकायतकर्ता को ‘शादी’ का प्रमाण देना होगा, न कि केवल ‘रिश्ते’ का।
राहत73 वर्षीय पति, उनके दो बेटों और 51 वर्षीय अन्य महिला को मामले से मुक्त किया गया।

दूसरी शादी’ का ठोस सबूत होना अनिवार्य

हाईकोर्ट के जस्टिस आर. नटराज की बेंच ने एक 66 वर्षीय महिला द्वारा अपने पति और बेटों के खिलाफ दायर शिकायत को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि द्विविवाह का आरोप साबित करने के लिए ‘दूसरी शादी’ का ठोस सबूत होना अनिवार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अन्य साथी के साथ केवल “लिव-इन रिलेशनशिप” में रहना कानूनी रूप से शादी नहीं माना जा सकता, और इसलिए इसे IPC की धारा 494 के तहत अपराध नहीं कहा जा सकता।

कानूनी पेच: क्या लिव-इन ‘शादी’ है?

  • अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 494 की व्याख्या की।
  • विवाह अनिवार्य: यह धारा केवल तब लागू होती है जब कोई व्यक्ति अपने पति या पत्नी के जीवित रहते हुए “दूसरी शादी” (Marries) करता है।
  • अवैध संबंध बनाम शादी: महिला ने अपनी शिकायत में केवल यह कहा था कि उसका पति दूसरी महिला के साथ “अवैध संबंध” में रह रहा है। कोर्ट ने कहा कि केवल साथ रहने या रिश्ता होने को कानूनन ‘विवाह’ नहीं माना जा सकता।
  • अदालत की टिप्पणी: “यह अब अच्छी तरह से स्थापित है कि द्विविवाह का अपराध तभी बनता है जब कोई व्यक्ति औपचारिक रूप से दूसरी शादी करता है।”

बेटों पर कार्रवाई गलत: ‘उकसाना’ (Abetment) लागू नहीं

  • इस मामले में पत्नी ने अपने दो बेटों को भी आरोपी बनाया था, यह दावा करते हुए कि वे अपने पिता का साथ दे रहे हैं।
  • केवल जीवनसाथी जिम्मेदार: कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाया कि द्विविवाह के अपराध के लिए केवल वही पति या पत्नी जिम्मेदार होते हैं जिन्होंने दूसरी शादी की है।
  • धारा 109 (Abetment): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि द्विविवाह के मामलों में ‘उकसाने’ या सहायता करने के लिए रिश्तेदारों (बच्चों या परिवार) के खिलाफ मामला नहीं चलाया जा सकता।
  • निर्णय: निचली अदालत ने बिना कानूनी बारीकियों को समझे बेटों और दूसरी महिला के खिलाफ संज्ञान लेकर गलती की थी।

शिकायतकर्ता की विफलता

हाई कोर्ट ने नोट किया कि शिकायत करने वाली महिला यह बताने में विफल रही कि उसके पति ने दूसरी महिला से कब और कहाँ शादी की? क्या शादी की अनिवार्य रस्में निभाई गई थीं? केवल ‘धारणा’ के आधार पर कि वे साथ रह रहे हैं, आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

सबूत का बोझ (Burden of Proof)

कर्नाटक हाई कोर्ट का यह फैसला यह साफ करता है कि आपराधिक कानूनों में शब्दों का बहुत महत्व है। “लिव-इन रिलेशनशिप” के अपने अलग कानूनी अधिकार हो सकते हैं (जैसे घरेलू हिंसा से सुरक्षा), लेकिन जब बात ‘द्विविवाह’ (Bigamy) जैसे गंभीर अपराध की आती है, तो कानून केवल ‘वैध विवाह’ के अस्तित्व को ही स्वीकार करता है।

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