Press Day: देश में ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ और ‘ओपन कोर्ट’ (खुली अदालत) के सिद्धांत को मजबूती देने वाला एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है।
स्वत: संज्ञान वाली को खारिज करते हुए किया बंद
पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह और जस्टिस अमरजोत भट्टी की डिवीजन बेंच ने 6 मई 2026 को दिए अपने फैसले में एक सिंगल जज द्वारा देश के तीन बड़े अखबारों के खिलाफ शुरू की गई ‘सुओ मोटो’ (स्वत: संज्ञान) आपराधिक अवमानना कार्यवाही को पूरी तरह खारिज और बंद (Dismissed) कर दिया है। हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक व्यवस्था देते हुए साफ किया है कि अदालत में खुले तौर पर (Open Court) सुनाए या डिक्टेट कराए गए फैसलों को जज के हस्ताक्षर होने से पहले ही मीडिया में रिपोर्ट करना अदालत की अवमानना (Criminal Contempt) के दायरे में नहीं आता।
क्या था पूरा विवाद? (जज साहब के फैसले से पहले अखबार में आई खबर)
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ था जब हाई कोर्ट के ही एक सिंगल जज जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने 9 अप्रैल को खुली अदालत में एक फैसला सुनाया था। यह मामला पंजाब के कुछ पूर्व पुलिस अधिकारियों से जुड़े एक मुकदमे को फरीदकोट से चंडीगढ़ ट्रांसफर करने से संबंधित था।
अखबारों ने छापी खबर: अगले ही दिन, 10 अप्रैल को देश के तीन प्रतिष्ठित समाचार पत्रों द ट्रिब्यून (The Tribune), हिंदुस्तान टाइम्स (Hindustan Times) और द टाइम्स ऑफ इंडिया (The Times of India) ने इस फैसले की खबर प्रमुखता से प्रकाशित की।
सिंगल जज का गुस्सा और अवमानना का नोटिस: चूंकि जज साहब ने तब तक फैसले की कॉपी पर अपने हस्ताक्षर (Sign) नहीं किए थे, इसलिए 11 अप्रैल को उन्होंने इस मीडिया रिपोर्टिंग पर कड़ा ऐतराज जताया। जस्टिस दहिया ने माना कि यह ‘अदालत की सीमा को लांघने’ (Overreach) और न्याय व्यवस्था में हस्तक्षेप करने जैसा है। उन्होंने ‘द ट्रिब्यून’ की एडिटर-इन-चीफ ज्योति मल्होत्रा और अन्य अखबारों के संपादकों/संवाददाताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना का केस दर्ज करने के लिए मामला डिवीजन बेंच को भेज (Reference) दिया था।
डिवीजन बेंच ने क्यों माना मीडिया को बेकसूर? (सुप्रीम कोर्ट के 2 बड़े नियम)
डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के तर्कों को खारिज करते हुए मीडिया के पक्ष में बेहद अहम टिप्पणियां कीं।
सुनाते ही लागू हो जाता है फैसला: हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जैसे ही कोई फैसला खुली अदालत में औपचारिक रूप से ‘प्रोनाउंस’ (सुना) दिया जाता है, वह तुरंत प्रभावी और लागू (Operative Pronouncement) माना जाता है। इसके लागू होने के लिए इस पर जज के दस्तखत होने का इंतजार करना जरूरी नहीं है।
सच्ची और सटीक रिपोर्टिंग अवमानना नहीं: कोर्ट ने नोट किया कि तीनों अखबारों ने अपनी रिपोर्ट में वही लिखा जो जज साहब ने कोर्ट में बोला था। खबरों में कुछ भी झूठा या मनगढ़ंत नहीं था। बेंच ने कहा कि जब तक कोई रिपोर्ट निष्पक्ष (Fair) और पूरी तरह सटीक (Accurate) है, तब तक अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग करने के लिए किसी पत्रकार या संपादक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
डिजिटल विश्लेषण: ‘प्रेस की आजादी’ और ‘न्यायपालिका’ के बीच संतुलन
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का यह फैसला देश में खोजी पत्रकारिता और कोर्ट बीट कवर करने वाले मीडियाकर्मियों के लिए एक बड़ी ढाल है।
| कोर्ट की स्थिति | पुराना नजरिया (सिंगल जज) | नया और आधुनिक नियम (डिवीजन बेंच) |
| फैसला डिक्टेट होने के बाद | जब तक जज साइन न कर दें और ऑर्डर वेबसाइट पर अपलोड न हो, तब तक खबर छापना गैर-कानूनी है। | खुली अदालत में जज का बोलना ही ‘पब्लिक रिकॉर्ड’ है। मीडिया उसे तुरंत जनता तक पहुंचा सकता है। |
| अवमानना (Contempt) का पैमाना | कोर्ट की प्रक्रिया पूरी होने से पहले खबर आने को न्याय में दखल माना गया था। | जब तक खबर 100% सच्ची और सटीक है, तब तक निष्पक्ष रिपोर्टिंग करना प्रेस का संवैधानिक अधिकार है। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
यह फैसला अदालतों के भीतर ‘पारदर्शिता’ (Transparency) को बढ़ावा देने वाला है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र में मीडिया का काम अदालत के बंद कमरों से निकलने वाले आदेशों की लाइव और सटीक जानकारी जनता तक पहुंचाना है। अगर जज साहब ने कोर्ट रूम में वकीलों के सामने अपना फैसला बोल दिया है, तो मीडिया पर उसे लिखने से सिर्फ इसलिए नहीं रोका जा सकता क्योंकि जज के पेन ने अभी तक कागज पर दस्तखत नहीं किए हैं।

