Bar Letter: कानूनी रिसर्च और ड्राफ्टिंग के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और चैटजीपीटी (ChatGPT) जैसे टूल्स का अंधाधुंध इस्तेमाल करने वाले वकीलों को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है।
संसद में पूछे गए सवाल का बीसीआई ने यह दिया जवाब
बीसीआई ने संसद (Parliament) में पूछे गए एक सवाल का लिखित जवाब देते हुए साफ किया है कि अदालत में AI द्वारा जेनरेट किए गए फर्जी अदालती फैसलों (Fake Citations) या मनगढ़ंत कानूनी दलीलों को पेश करने पर वकीलों को अपनी जिम्मेदारी से भागने नहीं दिया जाएगा। वकील यह कहकर नहीं बच सकते कि ‘यह गलती मशीन या तकनीक ने की है।’
‘मशीन वकालतनामा साइन नहीं करती, वकील करता है’: BCI
संसद के सवाल का जवाब देते हुए देश में वकीलों की इस सर्वोच्च नियामक संस्था (Regulatory Body) ने बेहद तार्किक और सख्त रुख अपनाया। कहा, यदि अदालत के समक्ष कोई झूठा मामला, फर्जी कोटेशन या गुमराह करने वाली कानूनी दलील पेश की जाती है, तो वकील यह कहकर अपनी जवाबदेही (Accountability) से नहीं बच सकता कि इसे एक मशीन ने तैयार किया था। मशीन न तो वकालतनामे या याचिकाओं पर हस्ताक्षर करती है और न ही अदालत के प्रति उसकी कोई नैतिक जिम्मेदारी है। ये सभी कर्तव्य केवल और केवल वकील के हैं।
सुप्रीम कोर्ट भी जता चुका है गंभीर चिंता
बीसीआई ने अपनी रिपोर्ट में इस साल की शुरुआत में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ के समक्ष आए कुछ मामलों का भी हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई थी कि
- वकील ऐसी याचिकाएं दायर कर रहे हैं जिनमें एआई टूल्स द्वारा बनाए गए ऐसे अदालती फैसलों (Citations) का जिक्र है, जो वास्तव में पूरी दुनिया में वजूद में ही नहीं हैं (Non-Existent Judgments)।
- ‘गुम्माडी उषा रानी बनाम सुरे मल्लीकार्जुन राव’ मामले में तो सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक संज्ञान लिया कि एक निचली अदालत (Trial Court) ने भी फैसला सुनाते समय अनजाने में एआई द्वारा तैयार काल्पनिक जजमेंट पर भरोसा कर लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि फर्जी एआई फैसलों पर आधारित कोई भी निर्णय सिर्फ एक भूल नहीं, बल्कि ‘घोर कदाचार’ (Misconduct) माना जाएगा जिसके कानूनी परिणाम होंगे।
वकीलों के लिए क्या वैध है और क्या अवैध? (BCI की गाइडलाइन)
बार काउंसिल ने साफ किया कि भारत में वकालत में एआई (AI) का इस्तेमाल प्रतिबंधित या बैन नहीं है, लेकिन इसके नियम तय हैं।
| 🟢 वकील इन कामों के लिए AI का इस्तेमाल कर सकते हैं | 🔴 इन परिस्थितियों में वकीलों पर होगा कड़ा एक्शन |
| प्राथमिक कानूनी रिसर्च और केस लॉ खोजना। | एआई से मिले किसी भी कानून, धारा या पुराने फैसले को बिना प्रामाणिक सरकारी किताबों/वेबसाइट्स से वेरिफाई (Verify) किए सीधे कोर्ट में पेश करना। |
| अदालती रिकॉर्ड्स की इंडेक्सिंग और ड्राफ्टिंग में भाषा सुधारना। | क्लाइंट की बेहद गोपनीय बातें, केस की रणनीतियां या निजी दस्तावेज असुरक्षित एआई प्लेटफॉर्म्स पर अपलोड करना (Breach of Confidentiality)। |
| लंबे-चौड़े दस्तावेजों का सारांश (Summarisation) तैयार करना। | कम समय में केस तैयार करने के चक्कर में एआई द्वारा गढ़े गए झूठे और काल्पनिक उदाहरणों को कोर्ट के सामने सच बताकर पेश करना। |
कानून की किस धारा के तहत जा सकती है वकीलों की सनद (License)?
बीसीआई ने संसद को आश्वस्त किया कि एआई के दुरुपयोग को रोकने के लिए देश में अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) का मौजूदा कानूनी ढांचा ही पूरी तरह सक्षम है।
यदि कोई वकील गैर-जिम्मेदाराना तरीके से एआई का उपयोग करता है और अदालत को गुमराह करता है, तो उसके खिलाफ अधिवक्ता अधिनियम की धारा 35 और 36 के तहत ‘पेशेवर कदाचार’ (Professional Misconduct) का मुकदमा चलाया जाएगा। इसके तहत दोषी पाए जाने पर संबंधित राज्य की बार काउंसिल वकील का लाइसेंस हमेशा के लिए रद्द (Enrolment Terminate) कर सकती है या उन्हें वकालत करने से सस्पेंड कर सकती है।
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
बार काउंसिल ऑफ इंडिया का यह रुख स्पष्ट करता है कि तकनीक कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, वह किसी वकील के विवेक, उसकी बुद्धिमत्ता और अदालत के प्रति उसकी वफादारी की जगह नहीं ले सकती। एआई केवल एक ‘सहायक उपकरण’ (Assistive Tool) है, वह कोई ‘वकील’ नहीं है। भारतीय अदालतों में पैरवी करने वाले हर वकील को अब एआई से मिलने वाले हर एक फुल-स्टॉप और कॉमा को कोर्ट रूम में कदम रखने से पहले खुद अपनी आंखों से जांचना होगा।

