UP Police vs. High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बस्ती जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) डॉ. यशवीर सिंह की कार्यप्रणाली और कानूनी समझ पर सख्त टिप्पणी करते हुए उनसे व्यक्तिगत हलफनामा मांगा है।
हाईकोर्ट के जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने रत्नेश कुमार (राजू शुक्ला) की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि एक जिले के पुलिस प्रमुख का यह कहना कि अग्रिम जमानत याचिका मजिस्ट्रेट के यहां लंबित है, उनकी कानून की बुनियादी जानकारी पर सवाल खड़ा करता है। कोर्ट ने न केवल एक हलफनामे में उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री का नाम घसीटने पर आपत्ति जताई, बल्कि SP द्वारा कानून की गलत व्याख्या करने पर उन्हें बुरी तरह फटकारा।
विवाद की जड़: जांच अधिकारी (IO) का निलंबन
- मामला: सितंबर 2024 में हत्या के प्रयास का एक मामला दर्ज हुआ था, जिसमें सात लोगों पर पीड़ित को गोली मारने और रॉड से हमला करने का आरोप था।
- विवाद: जांच अधिकारी ने जब फरार आरोपियों के खिलाफ स्थानीय कोर्ट से गैर-जमानती वारंट (NBW) हासिल किया, तो SP ने उस अधिकारी को ही निलंबित (Suspend) कर दिया।
- कोर्ट का रुख: हाई कोर्ट ने इसे ‘अदालत की अवमानना’ माना। कोर्ट ने कहा कि वारंट मजिस्ट्रेट ने अपने विवेक से जारी किया था, ऐसे में SP का यह कहना कि ‘बिना सबूत वारंट लिया गया’, सीधे तौर पर अदालत के फैसले पर सवाल उठाना है।
उप-मुख्यमंत्री का नाम और SP की सफाई
- सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि SP ने अपने हलफनामे में राज्य के डिप्टी सीएम का जिक्र किया था।
- SP का तर्क: SP ने दावा किया कि एक आरोपी ने डिप्टी सीएम के सामने प्रतिनिधित्व (Representation) दिया था कि जांच अधिकारी (IO) ने सबूतों को नजरअंदाज किया और वह पैसे की मांग कर रहा था। इसी जांच के आधार पर IO को सस्पेंड किया गया।
- कोर्ट की आपत्ति: बेंच ने पूछा कि हलफनामे में डिप्टी सीएम का नाम उल्लेख करने की क्या आवश्यकता थी और यह किस आधार पर किया गया।
कानूनी भूल: मजिस्ट्रेट नहीं दे सकता अग्रिम जमानत
- सबसे बड़ी फटकार तब लगी जब SP ने हलफनामे में लिखा कि कई आरोपियों की अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) याचिकाएं मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित हैं।
- कानूनी तथ्य: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) या पुरानी CrPC के तहत, केवल सत्र न्यायालय (Sessions Court) या हाई कोर्ट ही अग्रिम जमानत दे सकते हैं। मजिस्ट्रेट के पास यह शक्ति नहीं है।
- कोर्ट की टिप्पणी: “यदि एक जिले के SP को यह नहीं पता कि मजिस्ट्रेट अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला नहीं कर सकता, तो उनकी कानून की बेसिक जानकारी के बारे में कुछ न कहना ही बेहतर है।”
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| याचिकाकर्ता | रत्नेश कुमार उर्फ राजू शुक्ला (निष्पक्ष जांच की मांग)। |
| दोषी अधिकारी | डॉ. यशवीर सिंह, एसपी बस्ती। |
| कोर्ट की चेतावनी | संतोषजनक जवाब न मिलने पर आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही। |
| अगली सुनवाई | 29 अप्रैल, 2026 (व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने की अंतिम तिथि)। |
वर्दी और कानून की मर्यादा
यह मामला प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग और कानूनी अज्ञानता का एक गंभीर उदाहरण बन गया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस अधिकारी अपनी जांच में स्वतंत्र हो सकते हैं, लेकिन वे अदालती आदेशों (NBW) को चुनौती नहीं दे सकते और न ही कानून की गलत व्याख्या कर सकते हैं। 29 अप्रैल को SP को इन सभी बिंदुओं पर अपना स्पष्टीकरण देना होगा।

