Wednesday, September 9, 2026
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Muslim women visiting: मस्जिद जाने पर रोक नहीं… मगर मुख्य द्वार से प्रवेश या पुरुषों के साथ खड़े होने की जिद गलत, जाने AIMPLB की दलील

Muslim women visiting: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की बेंच उन संवैधानिक सवालों पर सुनवाई कर रही है, जो सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के 2018 के फैसले के बाद उपजे थे। सुनवाई का असर पुणे के एक दंपति द्वारा दायर उस याचिका पर भी पड़ेगा जिसमें मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में नमाज अदा करने की अनुमति मांगी गई है।

इस्लाम और मस्जिद: बोर्ड का रुख

  • बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एम. आर. शमशाद ने स्पष्ट किया।
  • प्रवेश पर रोक नहीं: इस्लाम में महिलाओं के मस्जिद जाने या वहां नमाज पढ़ने पर कोई धार्मिक पाबंदी नहीं है। खुद पैगंबर मोहम्मद ने कहा था, “महिलाओं को मस्जिद आने से न रोकें।”
  • अनिवार्यता बनाम प्राथमिकता: पुरुषों के लिए जमात (Congregation) में नमाज पढ़ना अनिवार्य (Obligatory) है, जबकि महिलाओं के लिए यह अनिवार्य नहीं है। उनके लिए घर पर नमाज पढ़ना अधिक ‘श्रेयस्कर’ (Preferable) माना गया है, ताकि घर और बच्चों की देखभाल प्रभावित न हो।

अनुशासन’ और ‘बाधा’ (The Conflict of Protocol)

  • बोर्ड ने पुणे के दंपति की याचिका के कुछ हिस्सों का विरोध किया, जिसमें महिलाओं के लिए ‘मुख्य द्वार’ से प्रवेश और पुरुषों के साथ बिना किसी ‘बैरियर’ (ओट) के नमाज पढ़ने की मांग की गई थी।
  • मुख्य द्वार की जिद: बोर्ड ने कहा कि महिलाएं मुख्य द्वार से प्रवेश की मांग नहीं कर सकतीं। मस्जिदों में महिलाओं के लिए अलग प्रवेश और बैठने की व्यवस्था ‘धार्मिक अनुशासन’ का हिस्सा है।
  • बैरियर (Separation): नमाज के दौरान पुरुषों और महिलाओं के बीच पर्दा या बैरियर होना एक परंपरा है जिसका पालन जरूरी है।
  • गर्भगृह का अभाव: बोर्ड ने दलील दी कि मस्जिद के भीतर ‘गर्भगृह’ (Sanctum Sanctorum) जैसी कोई अवधारणा नहीं है। इसलिए कोई भी यह जिद नहीं कर सकता कि उसे किसी विशेष स्थान (जैसे इमाम के पीछे) पर ही खड़ा होना है।

जस्टिस अमानुल्लाह की टिप्पणी: “बच्चों की देखभाल”

सुनवाई के दौरान बेंच में शामिल जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कुछ व्यावहारिक बिंदुओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए मस्जिद जाना अनिवार्य न होने का एक कारण यह भी था कि जब परिवार के अन्य सदस्य नमाज के लिए जाएं, तो घर पर बच्चों की देखभाल के लिए किसी का होना जरूरी है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पैगंबर के समय से ही यह परंपराएं प्रबंधित (Managed) हैं।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
अदालतसुप्रीम कोर्ट की 9-न्यायाधीशों की बेंच।
मुद्दामस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और प्रार्थना का अधिकार।
AIMPLB का तर्कप्रवेश की अनुमति है, लेकिन ‘धार्मिक प्रोटोकॉल’ और ‘प्रवेश द्वार’ बोर्ड तय करेगा।
महत्वइस फैसले का असर सबरीमाला, पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिर और मस्जिदों के विवाद पर पड़ेगा।

सबरीमाला रेफरेंस क्यों महत्वपूर्ण है?

यह सुनवाई केवल मस्जिदों तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट यह तय कर रहा है कि क्या अदालतें किसी धर्म की ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं’ (Essential Religious Practices) में हस्तक्षेप कर सकती हैं? क्या ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ (अनुच्छेद 25) के अधिकार ‘समानता के अधिकार’ (अनुच्छेद 14) से ऊपर हैं?

परंपरा बनाम आधुनिक अधिकार

मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर AIMPLB का यह रुख एक ‘मध्य मार्ग’ (Middle Path) की तरह दिखता है। जहाँ एक तरफ बोर्ड प्रवेश के सिद्धांत को स्वीकार करता है, वहीं दूसरी तरफ वह मस्जिद के आंतरिक प्रबंधन और अनुशासन (जैसे अलग रास्ता या पर्दा) पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है। अदालत का अंतिम फैसला यह तय करेगा कि ‘धार्मिक अनुशासन’ की सीमा कहाँ खत्म होती है और ‘संवैधानिक समानता’ कहाँ शुरू होती है।

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