Saturday, September 19, 2026
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Kejriwal vs. Judiciary-1 : अब इस कोर्ट की कार्यवाही में भाग नहीं लूंगा…केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को लिखा पत्र, कहा- यह विद्रोह नहीं, अंतरात्मा की आवाज है

Kejriwal vs. Judiciary-1 : अरविंद केजरीवाल द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को लिखा गया पत्र भारतीय न्यायिक इतिहास में एक असाधारण मोड़ है।

जज के ‘पूर्वाग्रह’ (Bias) की आशंका जताई थी

यह कदम जस्टिस शर्मा द्वारा केजरीवाल की उस याचिका को खारिज करने के बाद उठाया गया है, जिसमें उन्होंने जज के ‘पूर्वाग्रह’ (Bias) की आशंका जताते हुए उन्हें इस केस से हटने (Recusal) का अनुरोध किया था। इस घटना में केजरीवाल ने आबकारी नीति मामले (Excise Policy Case) की कार्यवाही में आगे भाग लेने से इनकार कर दिया है। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा ‘रिक्यूजल’ (Recusal) याचिका खारिज किए जाने के बाद, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सीधे जज को पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया है।

केजरीवाल के पत्र की मुख्य बातें (Key Arguments in Letter)

  • केजरीवाल ने अपने फैसले को महात्मा गांधी के ‘सत्याग्रह’ और ‘अंतरात्मा की आवाज’ से जोड़ते हुए निम्नलिखित तर्क दिए हैं।
  • निष्पक्षता पर संदेह: उन्होंने चिंता जताई कि जस्टिस शर्मा के बच्चे केंद्र सरकार के पैनल में वकील हैं, जिससे हितों का टकराव (Conflict of Interest) हो सकता है।
  • अदालत की भाषा: केजरीवाल के अनुसार, उनकी याचिका को न्यायपालिका पर “हमला” बताना यह दर्शाता है कि अब इस बेंच के सामने निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद कम है।
  • शांतिपूर्ण विरोध: उन्होंने लिखा कि यह कोई विद्रोह नहीं बल्कि एक विनम्र निर्णय है कि वे अब इस बेंच के सामने न तो खुद पेश होंगे और न ही उनके वकील।
  • परिणाम भुगतने को तैयार: उन्होंने स्वीकार किया कि इससे उनके कानूनी हितों को नुकसान हो सकता है, लेकिन वे इसके लिए तैयार हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट का कड़ा रुख (The Court’s Stand)

  • इससे पहले, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने केजरीवाल की याचिका खारिज करते हुए सख्त टिप्पणी की थी।
  • धारणा का थिएटर नहीं: कोर्ट ने कहा, “अदालत कक्ष धारणाओं (Perceptions) का थिएटर नहीं बन सकता।” बिना ठोस सबूत के केवल आशंका के आधार पर जज को हटने के लिए नहीं कहा जा सकता।
  • संस्थागत विश्वसनीयता: कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसी याचिकाओं को स्वीकार करना एक गलत मिसाल कायम करेगा और न्यायिक संस्था की साख को नुकसान पहुँचाएगा।
  • योग्यता का आकलन: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी जज की योग्यता उच्च न्यायालयों द्वारा तय की जाती है, न कि मुकदमों में शामिल पक्षों (Litigants) द्वारा।

‘न्याय होना ही नहीं, दिखना भी चाहिए’ (The Principle of Justice)

केजरीवाल ने अपने पत्र में प्रसिद्ध कानूनी सिद्धांत का हवाला दिया कि “न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।” उनका तर्क है कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस मामले में सार्वजनिक धारणा यह बन सकती है कि परिणाम पहले से तय है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
मुख्य पक्षअरविंद केजरीवाल (AAP प्रमुख) बनाम सीबीआई (CBI)।
जजजस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा (दिल्ली हाई कोर्ट)।
मुद्दाआबकारी नीति मामले में केजरीवाल को ‘डिस्चार्ज’ करने के खिलाफ CBI की चुनौती।
वर्तमान स्थितिकेजरीवाल ने आगे की कार्यवाही का बहिष्कार करने का फैसला किया है।
अगला कदमकेजरीवाल इस ‘रिक्यूजल ऑर्डर’ को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं।

न्यायपालिका के लिए नई चुनौती

यह स्थिति भारतीय न्यायपालिका के सामने एक नई तरह की चुनौती पेश करती है। जहाँ एक तरफ जज का हटना केवल ठोस सबूतों पर आधारित होना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ एक हाई-प्रोफाइल आरोपी द्वारा कार्यवाही में भाग न लेना अदालती गरिमा और प्रक्रिया पर सवाल उठाता है। अब सबकी नजरें इस बात पर होंगी कि दिल्ली हाई कोर्ट केजरीवाल की अनुपस्थिति में इस मामले को कैसे आगे बढ़ाता है और क्या सुप्रीम कोर्ट इस पर हस्तक्षेप करेगा।

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