Sunday, July 26, 2026
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No More Digital Spying: बेल Vs सर्विलांस… पुलिस की डिजिटल बेड़ियां टूटीं- कहा-जमानत के नाम पर 24 घंटे निगरानी करके गलत कर रहे हैं

No More Digital Spying: कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की बेंच ने निजता के अधिकार (Right to Privacy) और जमानत की शर्तों के बीच संतुलन बनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी आरोपी को जमानत देते समय ‘लाइव जीपीएस लोकेशन’ (Live GPS Location) साझा करने के लिए मजबूर करना उसकी निरंतर इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के समान है, जो कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है। यह मामला जबरन वसूली (Extortion) और आपराधिक धमकी के एक आरोपी से जुड़ा है, जिसे उडुपी की एक सत्र अदालत ने अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) देते समय कुछ शर्तें थोपी थीं।

विवाद की जड़: हमेशा ऑन रहे लोकेशन

  • सत्र अदालत ने आरोपी को जमानत देते समय कई सामान्य शर्तें लगाई थीं, लेकिन आखिरी शर्त विवादित थी।
  • शर्त: आरोपी को अपना मोबाइल फोन हमेशा ऑन रखना होगा और उसकी ‘लाइव लोकेशन’ जांच अधिकारी (IO) के साथ साझा करनी होगी।
  • चुनौती: आरोपी ने इन शर्तों में ढील देने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: सीमा पार करना गलत

  • जस्टिस नागप्रसन्ना ने सत्र अदालत की इस विशेष शर्त को पूरी तरह से रद्द कर दिया। कोर्ट के मुख्य तर्क निम्नलिखित थे।
  • निरंतर निगरानी: किसी व्यक्ति की लोकेशन को हर समय ट्रैक करना उसे ‘इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस’ के दायरे में रखने जैसा है। यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अनावश्यक अंकुश है।
  • अनुमति की सीमा: कोर्ट ने माना कि जमानत के लिए अन्य शर्तें (जैसे मुचलका भरना, गवाहों को न डराना) वैध हैं, लेकिन लोकेशन साझा करने का आदेश ‘अनुमेय प्रतिबंधों’ (Permissible Restrictions) की सीमा को पार करता है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
अदालतकर्नाटक हाई कोर्ट (जस्टिस एम. नागप्रसन्ना)।
फैसले की तारीख22 अप्रैल, 2026।
मुख्य आदेशलाइव जीपीएस लोकेशन शेयर करने की शर्त रद्द (Quashed)।
कानूनी आधारनिजता का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता।
आरोपजबरन वसूली और आपराधिक धमकी (Udupi Case)।

“प्रार्थना में अस्पष्टता” के बावजूद न्याय

दिलचस्प बात यह है कि हाई कोर्ट ने नोट किया कि आरोपी की याचिका काफी अस्पष्ट (Vague) थी और उसके वकील भी सुनवाई के दौरान मौजूद नहीं थे। इसके बावजूद, अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जमानत की शर्तों की जांच की और पाया कि ‘लोकेशन ट्रैकिंग’ की शर्त कानूनी रूप से गलत थी। कोर्ट ने कहा कि न्याय के हित में तकनीकी खामियों को दरकिनार कर गलत शर्तों को सुधारना जरूरी है।

निजता बनाम सुरक्षा

कर्नाटक हाई कोर्ट का यह फैसला उन डिजिटल बेड़ियों (Digital Shackles) के खिलाफ एक मजबूत स्टैंड है, जिन्हें पुलिस अक्सर जांच की सुविधा के नाम पर आरोपियों पर डाल देती है। यह आदेश याद दिलाता है कि जब तक किसी व्यक्ति का दोष साबित न हो जाए, तब तक उसे ‘कैदी’ की तरह 24 घंटे निगरानी में रखना उसके मानवाधिकारों का हनन है।

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