Tis Hazari Raid Case: दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने एक फैसले में 1991 के एक भ्रष्टाचार मामले में तीस हजारी कोर्ट में एसीबी की रेड की प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई है।
कांस्टेबल राम प्रसाद को पकड़ने के लिए ‘ट्रैप’ बिछाया था
यह मामला 1991 का है, जब ACB ने तीस हजारी कोर्ट के रूम नंबर 326 में कार्यवाही के दौरान ₹150 की रिश्वत के आरोप में कांस्टेबल राम प्रसाद को पकड़ने के लिए ‘ट्रैप’ बिछाया था। जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने तीस हजारी कोर्ट में तैनात रहे नाईब कोर्ट कांस्टेबल राम प्रसाद की सजा को रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया है। अदालत ने इस बात पर हैरानी व्यक्त की कि कैसे भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के अधिकारी एक मजिस्ट्रेट की “नाक के नीचे” कोर्ट की कार्यवाही के दौरान बिना अनुमति के छापेमारी कर सकते हैं।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ (Strictures by the Court)
- जस्टिस सुधा ने ACB की कार्यप्रणाली और तत्कालीन मजिस्ट्रेट की अनभिज्ञता पर कड़े सवाल उठाए।
- बिना अनुमति छापेमारी: कोर्ट ने पूछा कि ACB के अधिकारियों ने पीठासीन मजिस्ट्रेट या जिला न्यायाधीश से पूर्व अनुमति लिए बिना कोर्ट रूम के अंदर छापेमारी करने की हिम्मत कैसे की?
- मजिस्ट्रेट की भूमिका: अदालत ने टिप्पणी की, मजिस्ट्रेट उस समय क्या कर रहे थे कि उन्हें अपने कोर्ट रूम के भीतर हो रही इस घटना का पता नहीं चला? ऐसा लगता है कि मजिस्ट्रेट अपने ही कोर्ट में हो रही चीजों से पूरी तरह बेखबर थे।
- समझ से परे: जज ने कहा कि यह मेरी समझ से बाहर है कि कोई अधिकारी कोर्ट की कार्यवाही चलने के दौरान अंदर घुसकर किसी आरोपी को पकड़ने का साहस कैसे कर सकता है।
सजा रद्द करने के मुख्य कारण (Reasons for Acquittal)
- अदालत ने कांस्टेबल राम प्रसाद को निम्नलिखित कानूनी आधारों पर बरी किया।
- रिश्वत की मांग साबित नहीं: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के तहत सजा के लिए केवल पैसे की बरामदगी काफी नहीं है, बल्कि ‘रिश्वत की मांग’ (Demand) साबित होना अनिवार्य है। इस मामले में अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि कांस्टेबल ने पैसे मांगे थे।
- गवाहों के विरोधाभासी बयान: शिकायतकर्ता (एक छात्र) ने सुनवाई के दौरान विरोधाभासी बयान दिए। उसने यह भी कहा कि मांग किसी और व्यक्ति ने की थी, आरोपी ने नहीं।
- संदेह बनाम सबूत: कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ कड़ा संदेह हो सकता है, लेकिन कानून में संदेह कभी भी सबूत की जगह नहीं ले सकता।
मामले की पृष्ठभूमि (Background of the 1991 Case)
- आरोप: एक स्कूटर के चालान के निपटारे और दस्तावेजों की वापसी के बदले ₹150 की रिश्वत मांगी गई थी।
- ACB ट्रैप: छात्र की शिकायत पर ACB ने जाल बिछाया और कोर्ट रूम के अंदर से कांस्टेबल को पकड़ा।
- निचली अदालत का फैसला: 2001 में एक ट्रायल कोर्ट ने कांस्टेबल को दोषी ठहराया था, जिसे अब हाई कोर्ट ने पलट दिया है।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| अदालत | दिल्ली हाई कोर्ट (जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा)। |
| आरोपी | राम प्रसाद (नाईब कोर्ट कांस्टेबल)। |
| घटना का वर्ष | 1991 (तीस हजारी कोर्ट, दिल्ली)। |
| आरोप | ₹150 की रिश्वत (PC Act की धारा 7 और 13)। |
| फैसला | सजा रद्द और कांस्टेबल को सभी आरोपों से बरी किया गया। |
न्यायिक गरिमा की रक्षा
हाई कोर्ट का यह फैसला भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के साथ-साथ अदालतों की गरिमा और वहां की सुरक्षा व्यवस्था पर भी ध्यान केंद्रित करता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि भले ही मंशा सही हो, लेकिन जांच एजेंसियों को न्यायिक परिसर के भीतर कोई भी कार्रवाई करने के लिए तय प्रोटोकॉल और मजिस्ट्रेट की अनुमति का पालन करना अनिवार्य है।

