Property Law: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, केवल बिक्री राशि (Sale Consideration) का भुगतान न होना, एक पंजीकृत बिक्री विलेख (Registered Sale Deed) को रद्द करने का आधार नहीं बन सकता।
हाईकोर्ट के जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की बेंच ने ‘अखिलेश गुप्ता बनाम राजवंस वढेरा’ मामले में ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें पैसे न मिलने के कारण सेल डीड को शून्य (Void) घोषित कर दिया गया था। संपत्ति कानून से जुड़े मामले में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण बताया गया है।
मामला क्या था? (The Dispute Context)
- संपत्ति: दिल्ली के चावड़ी बाजार में स्थित एक दुकान।
- विवाद: विक्रेता (Plaintiff) ने अपने पड़ोसियों (Defendants) को दुकान बेचने के लिए 2016 में एक सेल डीड रजिस्टर की। डीड में ₹7.25 लाख के भुगतान का जिक्र था।
- आरोप: विक्रेता का दावा था कि खरीदार ने चेक देने का वादा किया था लेकिन कभी दिए नहीं। खरीदार ने बाद में जबरन दुकान पर कब्जा कर लिया।
- निचली अदालत का रुख: ट्रायल कोर्ट ने विक्रेता के पक्ष में फैसला सुनाया और सेल डीड रद्द कर दी क्योंकि खरीदार भुगतान साबित नहीं कर सका।
हाई कोर्ट का कानूनी तर्क (Core Legal Reasoning)
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘दहीबेन बनाम अरविंदभाई कल्याणजी भानुशाली (2020)’ और ‘विद्याधर बनाम मानिकराव’ मामलों का हवाला देते हुए निम्नलिखित कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किए।
A. स्वामित्व का हस्तांतरण (Transfer of Ownership)
- कानून: ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट के तहत, यदि एक बार सेल डीड निष्पादित (Execute) और पंजीकृत (Register) हो जाती है, तो संपत्ति का मालिकाना हक खरीदार के पास चला जाता है।
- भुगतान का प्रभाव: भले ही पूरी कीमत या उसका कोई हिस्सा न चुकाया गया हो, इससे सेल डीड की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ता।
B. विक्रेता के पास क्या रास्ता है? (Legal Remedy)
कोर्ट ने कहा कि यदि विक्रेता को पैसे नहीं मिले हैं, तो उसका कानूनी उपाय ‘बिक्री राशि की वसूली’ (Recovery of Money) के लिए मुकदमा करना है, न कि सेल डीड को रद्द करवाना।
C. कॉन्ट्रैक्ट एक्ट की धारा 25
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले को ‘बिना प्रतिफल के समझौते’ (Agreement without consideration) के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि डीड में प्रतिफल (Amount) तय था। इसलिए यह कॉन्ट्रैक्ट एक्ट के तहत शून्य नहीं है।
कोर्ट का अंतिम आदेश
- हाई कोर्ट ने संतुलन बनाते हुए खरीदार को राहत दी लेकिन विक्रेता के आर्थिक हितों की रक्षा भी की।
- निचली अदालत का आदेश रद्द: सेल डीड को रद्द करने के फैसले को सेट-साइड (Set aside) कर दिया गया।
- ब्याज सहित भुगतान: कोर्ट ने खरीदारों (Appellants) को आदेश दिया कि वे विक्रेता को ₹7.25 लाख की राशि सेल डीड की तारीख से 12% वार्षिक ब्याज के साथ चुकाएं।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| मुख्य सिद्धांत | Non-payment of consideration ≠ Cancellation of Sale Deed. |
| सही उपचार (Remedy) | बकाया राशि की वसूली के लिए दीवानी मुकदमा (Civil Suit for Recovery)। |
| कानूनी आधार | ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट और सुप्रीम कोर्ट के मिसाल (Precedents)। |
| ब्याज दर | विक्रेता को 12% ब्याज के साथ भुगतान का आदेश। |
प्रॉपर्टी डीलर्स और खरीदारों के लिए सबक
यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि रजिस्ट्री (Registration) एक बहुत ही शक्तिशाली कानूनी दस्तावेज है। विक्रेताओं को यह समझना चाहिए कि एक बार रजिस्ट्री पर हस्ताक्षर करने और उसे पंजीकृत करने के बाद, वे केवल इस आधार पर अपनी संपत्ति वापस नहीं पा सकते कि उन्हें भुगतान नहीं मिला। भुगतान सुनिश्चित करना रजिस्ट्री से पहले की जिम्मेदारी है; उसके बाद, यह केवल एक ‘वसूली का मामला’ रह जाता है।

