Crop Damage By Parrot: बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने वन्यजीव संरक्षण और किसानों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने वाला एक अनूठा फैसला सुनाया है।
यह कानूनी लड़ाई वर्धा जिले के 70 वर्षीय किसान महादेव डेकाटे ने लड़ी थी। उनके अनार के बाग को पास के वन्यजीव अभयारण्य से आए तोतों ने भारी नुकसान पहुंचाया था। हाईकोर्ट के जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस निवेदिता मेहता की बेंच ने स्पष्ट किया है कि ‘तोते’ (Parrots) वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत “वन्यजीव” (Wild Animals) की श्रेणी में आते हैं, और यदि वे फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं, तो राज्य सरकार को इसकी भरपाई करनी होगी।
मामला क्या था? (The Farmer’s Struggle)
- घटना: मई 2016 में महादेव के अनार के पेड़ों को जंगली तोतों ने बर्बाद कर दिया था। कृषि विभाग की जांच में पाया गया कि लगभग 50% फसल नष्ट हो गई थी।
- सरकारी इनकार: वन विभाग ने मुआवजा देने से यह कहकर मना कर दिया कि सरकारी संकल्पों (Government Resolutions) में केवल जंगली हाथियों और बाइसन (Bison) द्वारा किए गए नुकसान के लिए मुआवजे का प्रावधान है, पक्षियों के लिए नहीं।
कोर्ट का तर्क: कानून बनाम सरकारी संकल्प
- अदालत ने सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक टिप्पणियां कीं।
- समानता का अधिकार (Article 14): कोर्ट ने कहा कि केवल चुनिंदा प्रजातियों द्वारा किए गए नुकसान पर मुआवजा देना और अन्य को नजरअंदाज करना भेदभावपूर्ण है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1972 का केंद्रीय अधिनियम किसी भी ‘सरकारी संकल्प’ (GR) से ऊपर है। इस कानून की अनुसूची (Schedule) में तोतों को स्पष्ट रूप से ‘जंगली जानवर’ के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
- राज्य की संपत्ति: चूंकि कानूनन जंगली जानवर राज्य की संपत्ति हैं, इसलिए उनकी गतिविधियों से होने वाले नुकसान की वित्तीय जिम्मेदारी भी राज्य की है।
यदि मुआवजा नहीं दिया, तो किसान कानून हाथ में लेंगे: अदालत
जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के ने एक बहुत ही व्यावहारिक चिंता व्यक्त की। कहा, अगर किसानों को उनके नुकसान का मुआवजा नहीं मिलता, तो वे अपनी फसल बचाने के लिए वन्यजीवों को नुकसान पहुँचाने वाले उपाय (जैसे जहर देना या जाल बिछाना) अपना सकते हैं। इससे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| अदालत | बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच। |
| मुआवजा राशि | ₹200 प्रति पेड़ (कुल 200 क्षतिग्रस्त पेड़ों के लिए)। |
| कानूनी दर्जा | तोतों को ‘Wild Animals’ (वन्यजीव) माना गया। |
| महत्व | यह फैसला भविष्य में अन्य पक्षियों (जैसे मोर या कौवे) द्वारा किए गए नुकसान के दावों के लिए रास्ता खोलेगा। |
अन्नदाता की सुरक्षा अनिवार्य
हाई कोर्ट का यह फैसला महाराष्ट्र के हजारों उन किसानों के लिए राहत की खबर है जो अक्सर पक्षियों और अन्य छोटे जंगली जानवरों द्वारा फसल बर्बादी का सामना करते हैं। कोर्ट ने याद दिलाया है कि नागरिक को वन्यजीवों का रक्षक तभी बनाया जा सकता है जब राज्य उनके अधिकारों और मेहनत की सुरक्षा की गारंटी दे।

