Unjust Enrichment: जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ने उच्च शिक्षण संस्थानों द्वारा एडमिशन कैंसिल कराने पर फीस हड़पने की प्रवृत्ति पर एक बेहद कड़ा और नीतिगत फैसला सुनाया है।
आयोग के अध्यक्ष हिमांशु मिश्रा, सदस्य आरती सूद और नारायण ठाकुर की पीठ ने 25 मई 2026 को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाने वाले छात्रों को आंतरिक समय-सीमाओं के नाम पर वित्तीय रूप से बंधक नहीं बनाया जा सकता। फोरम ने मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MNIT), जयपुर को एक छात्रा की पूरी फीस (₹94,315) लौटाने का आदेश दिया है, जिसने आईआईटी (IIT) मंडी में चयन होने के बाद अपनी सीट छोड़ दी थी।
यह रही फोरम की टिप्पणी
फोरम ने शिक्षा के व्यावसायीकरण पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, उच्च शिक्षण संस्थान ज्ञान के केंद्र हैं, कोई व्यावसायिक या मुनाफा कमाने वाले उद्यम (Commercial or Profit-Maximising Ventures) नहीं हैं। उन्हें किसी छात्र के बेहतर शैक्षणिक अवसर चुनने के फैसले का फायदा उठाकर अनुचित रूप से खुद को समृद्ध करने (Unjust Enrichment) की अनुमति नहीं दी जा सकती। छात्र हमारे देश की असल बुनियाद हैं, और उनकी शैक्षणिक आकांक्षाओं व कानूनी अधिकारों को हमेशा शिक्षण संस्थानों के व्यावसायिक हितों से ऊपर रखा जाना चाहिए।
मामला क्या था? (MNIT जयपुर से IIT मंडी का सफर)
राजस्थान की रहने वाली एक छात्रा के साथ हुए यह घटनाक्रम हुआ।
एडमिशन और फीस जमा: छात्रा ने सत्र 2023-25 के लिए MNIT जयपुर में एमबीए (MBA) कार्यक्रम में प्रोविजनल एडमिशन लिया था और 26 जून 2023 को कुल ₹94,315 फीस जमा कराई थी।
IIT में चयन और रिफंड की मांग: बाद में छात्रा का चयन देश के शीर्ष संस्थान IIT मंडी में हो गया। इसके बाद उसने अकादमिक सत्र और पंजीकरण प्रक्रिया शुरू होने से काफी पहले, 1 अगस्त 2023 को MNIT से अपना एडमिशन वापस लेने और फीस रिफंड करने का अनुरोध किया।
सिर्फ कौशन मनी लौटाई: संस्थान ने अपने प्रॉस्पेक्टस के नियमों का हवाला देते हुए छात्रा की फीस का एक बड़ा हिस्सा (₹79,315) जब्त कर लिया और केवल ₹15,000 की कौशन मनी (Caution Money) वापस की। इसके खिलाफ छात्रा ने कांगड़ा उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई।
संस्थान की दलील: ‘हम UGC के नियमों से बंधे नहीं हैं’
सुनवाई के दौरान MNIT जयपुर के वकील आधार गुप्ता ने तर्क दिया कि एनआईटी अधिनियम, 2007 के तहत उनका संस्थान एक ‘राष्ट्रीय महत्व का संस्थान’ (Institute of National Importance) है जो सीधे भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन आता है। इसलिए वे यूजीसी (UGC) या एआईसीटीई (AICTE) के दिशानिर्देशों को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। उन्होंने यह भी दलील दी कि छात्रा ‘उपभोक्ता’ की परिभाषा में नहीं आती और सीट खाली रहने से संस्थान को वित्तीय नुकसान हुआ है।
उपभोक्ता फोरम का विधिक निष्कर्ष: संस्थान का ब्रोशर राष्ट्रीय नियमों से ऊपर नहीं
फोरम ने संस्थान की सभी दलीलों को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण और खारिज करने योग्य माना। फोरम ने अपने फैसले में मुख्य रूप से तीन बातें रेखांकित कीं।
UGC के नियम सर्वोपरि: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) देश में उच्च शिक्षा की सर्वोच्च वैधानिक संस्था है। अकादमिक वर्ष 2023-24 के लिए यूजीसी का स्पष्ट निर्देश था कि 30 सितंबर 2023 तक एडमिशन वापस लेने पर पूरी फीस रिफंड की जानी चाहिए। छात्रा ने 1 अगस्त को ही आवेदन दे दिया था, जो इस समय-सीमा के भीतर था।
प्रॉस्पेक्टस का बहाना नहीं चलेगा: कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी संस्थान का आंतरिक ब्रोशर या प्रॉस्पेक्टस उन राष्ट्रीय वैधानिक नियमों को ओवरराइड (Override) नहीं कर सकता, जो छात्रों को वित्तीय शोषण से बचाने के लिए बनाए गए हैं।
वेटिंग लिस्ट का इस्तेमाल क्यों नहीं किया?: फोरम ने नोट किया कि MNIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में मेधावी छात्रों की एक लंबी वेटिंग लिस्ट होती है। संस्थान ने अदालत में ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो कि उन्होंने उस खाली सीट को भरने के लिए वेटिंग लिस्ट को ऑपरेट करने का कोई प्रयास किया था।
विश्लेषण: उपभोक्ता फोरम का रिफंड और मुआवजा मैट्रिक्स
कांगड़ा उपभोक्ता फोरम ने संस्थान के इस रवैये को सेवा में घोर कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) माना और आदेश जारी किए।
| आदेश के मुख्य बिंदु | उपभोक्ता फोरम द्वारा निर्धारित वित्तीय देनदारी |
| रोकी गई फीस का रिफंड | संस्थान द्वारा रोकी गई शेष ₹94,315 की पूरी राशि छात्रा को तुरंत लौटाई जाए। |
| मानसिक उत्पीड़न का हर्जाना | संस्थान के अड़ियल रवैये और मानसिक प्रताड़ना के एवज में ₹10,000 का मुआवजा। |
| मुकदमेबाजी का खर्च | छात्रा को कानूनी लड़ाई में हुए व्यय के लिए ₹15,000 का भुगतान किया जाए। |
| फोरम का क्षेत्राधिकार | जब कोई संस्थान उस सीट के लिए पैसे रखता है जिस पर छात्र कभी बैठा ही नहीं, तो वह केवल ‘पैसे का कस्टोडियन’ है और यह मामला पूरी तरह उपभोक्ता फोरम के दायरे में आता है। |

