Generation Z: मद्रास हाईकोर्ट ने प्रेम संबंधों या एकतरफा लगाव में युवतियों द्वारा दूरी बना लेने या प्रस्ताव ठुकरा देने (Rejection) के बाद युवाओं में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति पर बेहद गंभीर चिंता व्यक्त की है।
हाईकोर्ट के जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने ‘उदयकुमार बनाम राज्य’ मामले में सुनवाई करते हुए समाज और युवा पीढ़ी की मानसिकता में आ रहे इस खतरनाक बदलाव को कड़े शब्दों में रेखांकित किया। अदालत ने कॉलेज के भीतर क्लासरूम में घुसकर एक छात्रा की निर्मम हत्या करने वाले दोषी की अपील को खारिज करते हुए उसकी उम्रकैद (Life Imprisonment) की सजा को बरकरार रखा है।
यह रही युवा पुरुषों के आक्रामक आचरण पर टिप्पणी
अदालत ने युवा पुरुषों के आक्रामक आचरण पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, हाल के दिनों में यह एक बेहद परेशान करने वाला ट्रेंड बन गया है जहां कोई लड़का, जिसका रिश्ता टूट जाता है या जिसे अस्वीकार कर दिया जाता है, यह मान बैठता है कि लड़की उसके साथ रिश्ता जारी रखने के लिए बाध्य है। यदि वह ऐसा नहीं करती, तो लड़के को लगता है कि उस लड़की की जान ले लेना भी पूरी तरह से जायज है।
खौफनाक वारदात: क्लासरूम में घुसकर लकड़ी के लट्ठे से हमला
यह मामला वर्ष 2016 का है, जिसने तमिलनाडु के शैक्षणिक संस्थानों को झकझोर कर रख दिया था।
घटनाक्रम: मृतका (सोनाली) करूर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में सिविल इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष की छात्रा थी। दोषी उदयकुमार और सोनाली के बीच पहले कुछ निकटता थी, लेकिन बाद में कुछ कारणों से सोनाली ने उससे दूरी बना ली। उदयकुमार इस ‘रिजेक्शन’ को बर्दाश्त नहीं कर पाया।
क्लासरूम में हत्या: 30 अगस्त 2016 की सुबह लगभग 10:30 बजे, आरोपी सीधे सोनाली के क्लासरूम में घुस गया। उसने बेंच पर बैठी सोनाली के सिर पर लकड़ी के भारी लट्ठे (Wooden Log) से अंधाधुंध वार किए। जब एक सहायक प्रोफेसर (Assistant Professor) ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो आरोपी ने उन पर भी हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल सोनाली की मदुरै के अपोलो अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई।
निचली अदालत का फैसला: करूर की स्थानीय अदालत ने आरोपी को भादंवि (IPC) की धारा 302 (हत्या), 449 (घर/भवन में अवैध प्रवेश), 324 (हथियार से चोट पहुंचाना) और 506(II) (आपराधिक धमकी) के तहत दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उसने हाई कोर्ट में अपील की थी।
जांच एजेंसी और गवाह बने सहपाठियों पर हाई कोर्ट की कड़ी फटकार
हाई कोर्ट ने दोषी की सजा को तो बरकरार रखा, लेकिन पुलिस की जांच के पुराने ढर्रे और घटना के समय मौजूद कॉलेज के छात्रों (मृतका के सहपाठियों) के उदासीन रवैये पर गहरी निराशा और नाराजगी जताई।
पुलिस की ‘मैकेनिकल’ जांच पर सवाल
अदालत ने जांच अधिकारी (IO) की कार्यप्रणाली की आलोचना की। गवाहों ने साफ कहा था कि आरोपी ने हत्या का हथियार (लकड़ी का लट्ठा) क्लासरूम में ही फेंक दिया था, लेकिन पुलिस ने अपनी चार्जशीट में पारंपरिक कहानी गढ़ते हुए दिखाया कि हथियार आरोपी की गिरफ्तारी के बाद उसकी निशानदेही पर एक झाड़ी से ‘बरामद’ किया गया था।
कोर्ट की टिप्पणी: “हमेशा की तरह, जांच अधिकारी, जिसे शायद जांच करने का बुनियादी ज्ञान भी नहीं है, यांत्रिक रूप से (Mechanically) रिकवरी का एक मनगढ़ंत सिद्धांत लेकर आ गया।” हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस की इस लापरवाही से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता, क्योंकि घायल प्रोफेसर (चश्मदीद गवाह) की गवाही और मेडिकल साक्ष्य बिल्कुल पुख्ता हैं।
सोशल मीडिया के पेपर टाइगर्स बने छात्र
वारदात के समय क्लासरूम में कई छात्र मौजूद थे, लेकिन ट्रायल के दौरान वे गवाही देने से मुकर गए (Turned Hostile)। इस पर कोर्ट ने बेहद तीखे शब्दों में कहा:
“सोशल मीडिया पर केवल असंतोष व्यक्त करने और बड़ी-बड़ी बातें करने का कोई फायदा नहीं है, जब तक कि वह वास्तविक जीवन में एक्शन में न बदले। अन्यथा, ये छात्र असल जिंदगी में केवल ‘कागज के शेर’ (Paper Tigers) बनकर रह जाएंगे। बड़े दुख और भारी मन के साथ कहना पड़ रहा है कि इन छात्रों ने अदालत में सच का साथ न देकर अपनी ही मृत सहपाठी को धोखा दिया है और नागरिक के रूप में अपने कर्तव्य में विफल रहे हैं।”
विधिक सारांश (Case Matrix)
| विधिक बिंदु | विवरण एवं अदालती निष्कर्ष |
| मामला / केस साइटेशन | उदयकुमार बनाम तमिलनाडु राज्य (Udaykumar v. State) |
| पीड़िता | सोनाली, तृतीय वर्ष, सिविल इंजीनियरिंग की छात्रा। |
| निचली अदालत का आदेश | धारा 302 IPC के तहत दोषी और उम्रकैद की सजा। |
| मदरास हाई कोर्ट का आदेश | अपील पूरी तरह खारिज; उम्रकैद की सजा बरकरार। |
| मुख्य विधिक आधार | घायल प्राध्यापक (Injured Witness) की विश्वसनीय गवाही और पोस्टमार्टम/मेडिकल रिपोर्ट। |

