Indian Army: मद्रास हाईकोर्ट ने भारतीय सेना के एक पूर्व रंगरूट (Recruit) की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए सैन्य अनुशासन पर एक बड़ा विधिक संदेश दिया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस आर. पूर्णिमा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सैन्य प्रशिक्षण के दौरान अनुशासनहीनता और हिंसा को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता, भले ही आरोपी अभी प्रशिक्षण के दौर में हो। इस मामले के विस्तृत कानूनी विश्लेषण और अदालती टिप्पणियों के आधार पर निम्नलिखित कारणों से इस रंगरूट को अपना पूरा सैन्य करियर गंवाना पड़ा।
प्रोबेशनर/प्रशिक्षु होने के नाते अत्यधिक सावधानी बरतने का दायित्व
अदालत ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ने अभी तक औपचारिक रूप से सशस्त्र बलों की मुख्य सेवा में प्रवेश भी नहीं किया था; वह केवल बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण से गुजर रहा था।
अदालत की टिप्पणी: एक प्रशिक्षु या प्रोबेशनर (परिवीक्षाधीन) के रूप में, सेवा की शुरुआत में ही उसे अपने आचरण को लेकर अत्यधिक सावधानी (Utmost Care) बरतनी चाहिए थी। प्रशिक्षण काल में ही हिंसक लड़ाई में शामिल होना यह दर्शाता है कि वह भविष्य में सेना के सख्त अनुशासन के अनुकूल नहीं है।
साथी रंगरूट को गंभीर शारीरिक चोट पहुंचाना (Grievous Injury)
यह विवाद 12 अप्रैल 2027 को बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण के दौरान दो रंगरूटों के बीच हुआ था।
उकसावे का बहाना अमान्य: कोर्ट ने माना कि भले ही दूसरी तरफ से कोई तात्कालिक उकसावा (Provocation) रहा हो, लेकिन यह बात याचिकाकर्ता को इस बात का अधिकार नहीं देती कि वह अपने ही साथी रंगरूट पर हिंसक हमला कर दे।
गंभीर चोट: याचिकाकर्ता के हमले के कारण साथी रंगरूट के जबड़े में गंभीर फ्रैक्चर (Fracture RT Mandible – दाहिने निचले जबड़े का टूटना) आया था, जिसे सेना ने ‘गंभीर कृत्य’ माना।
कोर्ट ऑफ इंक्वायरी में बिना शर्त दोष स्वीकार करना (Plea of Guilty)
जब 5 मई 2027 को सैन्य अधिकारियों द्वारा कोर्ट ऑफ इंक्वायरी (Court of Inquiry) बिठाई गई, तो आरोपी पर दो गंभीर आरोप तय किए गए। इसमें पहला बिना किसी पर्याप्त कारण के ड्यूटी के नियत स्थान पर उपस्थित न होना और दूसरा सैन्य अनुशासन और अच्छे आचरण के प्रतिकूल कार्य करना।
विधिक परिणाम: पूछताछ के दौरान याचिकाकर्ता ने किसी भी प्रकार की कानूनी रक्षा या परिस्थितियों का हवाला देने के बजाय दोनों आरोपों में अपना दोष स्वीकार (Pled Guilty) कर लिया। उसने केवल माफी की गुहार लगाई। विधिक रूप से, एक बार जब आरोपी स्वेच्छा से दोष स्वीकार कर लेता है, तो सक्षम प्राधिकारी (Summary Court Martial) को कानूनन उचित सजा तय करने का पूरा विवेकाधिकार मिल जाता है।
सैन्य अनुशासन के मानदंड आम नागरिक कानूनों से अलग होना
याचिकाकर्ता ने इस आधार पर हाई कोर्ट में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की मांग की थी कि उसकी सजा बहुत अधिक कठोर (Disproportionate) है।
हाई कोर्ट का विधिक रुख: अदालत ने 1 जून 2026 को दिए अपने आदेश में साफ किया कि अदालतों के पास सजा के असंतुलित होने पर न्यायिक समीक्षा का अधिकार तो है, लेकिन जब बात “सैन्य अनुशासन बनाए रखने” की हो, तो विचार करने के विधिक पैमाने बिल्कुल अलग हो जाते हैं। सेना की आंतरिक व्यवस्था और संप्रभुता के लिए अनुशासन सर्वोपरि है।
सेना द्वारा पहले ही ‘उदार रुख’ अपनाया जाना
सुनवाई के दौरान भारत के डिप्टी सॉलिसिटर जनरल (DSG) ने अदालत को बताया कि रंगरूट ने जो गंभीर अपराध किया था, उसके लिए ‘समरी कोर्ट मार्शल’ (Summary Court Martial) उसे कड़े कारावास (Imprisonment) की सजा भी दे सकता था।
अधिकारियों ने उस समय भी एक उदार दृष्टिकोण (Lenient View) अपनाया और उसे जेल भेजने के बजाय केवल ‘सेवा से बर्खास्त’ (Dismissal from Service) करने की सजा तक ही सीमित रखा। इसलिए, इस सजा को किसी भी स्तर पर अत्यधिक या क्रूर नहीं माना जा सकता।
विधिक यात्रा का घटनाक्रम (Timeline of the Litigation)
| तिथि / वर्ष | प्रशासनिक एवं विधिक घटनाक्रम |
| 19 दिसंबर 2016 | याचिकाकर्ता का भारतीय सेना में रंगरूट के रूप में नामांकन (Enrollment)। |
| 12 अप्रैल 2017 | प्रशिक्षण के दौरान साथी रंगरूट के साथ हिंसक झड़प और जबड़ा टूटना। |
| 05 मई 2017 | कोर्ट ऑफ इंक्वायरी का गठन; आरोपों पर रंगरूट द्वारा दोष स्वीकार करना। |
| 10 जनवरी 2018 | समरी कोर्ट मार्शल द्वारा सेवा से बर्खास्तगी का आदेश। |
| 05 अगस्त 2019 | सैन्य अपीलीय प्राधिकारी द्वारा रंगरूट की अपील खारिज। |
| अगस्त 2023 | सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT, प्रादेशिक बेंच, चेन्नई) द्वारा अपील खारिज। |
| 01 जून 2026 | मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ द्वारा याचिका पूरी तरह खारिज। |

