Friday, November 6, 2026
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Judicial Appointments: अस्पष्ट आरोपों पर नहीं बदलेगा फैसला…मद्रास HC ने 23 जिला जजों की नियुक्ति पर लगाई मुहर, यह है अहम फैसला

Judicial Appointments: मद्रास हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तमिलनाडु में 11 साल पहले (वर्ष 2013-14) हुई 23 जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

न्यायिक नियुक्तियों को अस्थिर नहीं कर सकते

जस्टिस अनीता सुमंत और जस्टिस मुम्मिनैनी सुधीर कुमार की पीठ ने स्पष्ट किया कि एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद “अस्पष्ट और सामान्य” आरोपों के आधार पर न्यायिक नियुक्तियों को अस्थिर नहीं किया जा सकता। यह मामला 2013 की जिला जज (प्रवेश स्तर) भर्ती से जुड़ा है, जिसमें असफल उम्मीदवारों ने चयन प्रक्रिया में धांधली और पारदर्शिता की कमी के आरोप लगाए थे।

मुख्य तर्क: चयन समिति के विवेक में हस्तक्षेप नहीं

  • अदालत ने चयन प्रक्रिया की शुचिता पर भरोसा जताया।
  • वरिष्ठ जजों की भूमिका: जिला जजों का चयन आमतौर पर वरिष्ठ न्यायाधीशों की समिति द्वारा किया जाता है जो पूरी गंभीरता और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हैं।
  • सीमित हस्तक्षेप: जब तक गंभीर और बहुत वैध चिंताएं न उठाई जाएं, कोर्ट को चयन समिति के विवेक में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। याचिकाकर्ताओं के आरोप “अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति” के थे।

इंटरव्यू मार्क्स पर विवाद (Viva Voce Controversy)

  • याचिकाकर्ता एन. भरतिराजन और ए. कन्नन ने तर्क दिया था कि लिखित परीक्षा में अच्छी रैंक होने के बावजूद इंटरव्यू (विवा) के बाद उनकी रैंक काफी गिर गई।
  • भरतिराजन: लिखित परीक्षा के बाद रैंक 26 थी, जो फाइनल लिस्ट में 67 हो गई।
  • कन्नन: रैंक 20 से गिरकर 73 पर आ गई।
  • कोर्ट का रुख: केवल रैंक गिरने के आधार पर पूरी चयन प्रक्रिया को मनमाना नहीं कहा जा सकता। 11 साल तक सेवा देने के बाद अब नए सिरे से इंटरव्यू कराने का निर्देश देना संस्थानों के लिए हानिकारक होगा।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

विवरणजानकारी
भर्ती विज्ञापन तिथि2 मई, 2013
चयनित पदों की संख्या23 जिला न्यायाधीश
याचिकाकर्ताओं की मांगचयन सूची रद्द करना और वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ नया इंटरव्यू।
कोर्ट का अंतिम निर्णययाचिकाएं खारिज; नियुक्तियां बरकरार।

विशिष्ट उम्मीदवारों के खिलाफ आरोपों की जांच

भले ही कोर्ट ने सामूहिक चुनौती को खारिज कर दिया, लेकिन उसने 4 विशिष्ट उम्मीदवारों के खिलाफ लगाए गए व्यक्तिगत आरोपों की गहराई से जांच की।

A. अनुभव और पात्रता (Eligibility)

  • आरोप था कि दो उम्मीदवारों के पास अनिवार्य 7 साल की वकालत का अनुभव नहीं था।
  • कोर्ट का फैसला: 2013 के विज्ञापन के अनुसार केवल संबंधित कोर्ट के पीठासीन अधिकारी का प्रमाण पत्र आवश्यक था, जो उन्होंने पेश किया था। अनुभव की “गुणवत्ता” को पूर्वव्यापी (Retrospectively) आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

B. आपराधिक रिकॉर्ड छिपाने का आरोप (Suppression of Cases)

  • दो जजों पर पुराने आपराधिक और दीवानी मामलों को छिपाने के आरोप थे।
  • केस 1: एक जज के खिलाफ 2004 का मामला था। कोर्ट ने पाया कि उन्हें कभी समन नहीं मिला और वे इससे अनभिज्ञ थे, इसलिए इसे ‘जानबूझकर छिपाना’ नहीं माना जा सकता।
  • केस 2: एक अन्य जज ने 2005 के एक मामले का खुलासा नहीं किया था जिसमें वे बरी (Acquit) हो चुके थे। सुप्रीम कोर्ट के ‘अवतार सिंह’ मामले का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि बरी होने के बाद ऐसी चूक को यंत्रवत (Mechanically) अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता।

समय का महत्व (Passage of Time)

कोर्ट ने अपने फैसले में बार-बार इस बात पर जोर दिया। चयनित उम्मीदवार 11 वर्षों से अधिक समय से न्यायपालिका में सेवा दे रहे हैं। इतने लंबे समय बाद नियुक्तियों को रद्द करना न्यायिक प्रशासन और संस्थागत स्थिरता के लिए गंभीर परिणाम ला सकता है।

संस्थागत स्थिरता बनाम पारदर्शिता

मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि नियुक्तियों को चुनौती देने का एक समय होता है। यदि प्रक्रिया में कोई बड़ी अवैधता साबित नहीं होती है, तो लंबे समय तक काम कर रहे अधिकारियों को केवल संदेह या सामान्य आरोपों के आधार पर नहीं हटाया जा सकता। यह फैसला न्यायिक अधिकारियों को कार्य सुरक्षा (Job Security) प्रदान करता है।

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