Sunday, June 21, 2026
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Criminal Intimidation: गुस्से में धमकी जुर्म नहीं होती…तीन वकीलों को बरी करते समय दी गई आपराधिक धमकी वाली परिभाषा जरूर पढ़ें

Criminal Intimidation: दिल्ली हाई कोर्ट ने 16 साल पुराने तीस हजारी कोर्ट विवाद मामले में तीन वकीलों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है।

अस्पष्ट धमकी या सामान्य नाराजगी मामले में निर्देश

जस्टिस नीना बंसल की पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी विवाद के दौरान गुस्से में दी गई अस्पष्ट धमकी या सामान्य नाराजगी को IPC की धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने रेखांकित किया कि कानूनी रूप से ‘आपराधिक धमकी’ के लिए यह साबित होना जरूरी है कि दी गई धमकी का उद्देश्य वास्तव में किसी को डराना या उसके आचरण को प्रभावित करना था। यह मामला जनवरी 2010 का है, जब तीस हजारी कोर्ट परिसर में एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान वकीलों और एक परिवार के बीच मारपीट और कहासुनी हुई थी।

मुख्य कानूनी सिद्धांत: ‘आपराधिक धमकी’ की परिभाषा

  • अदालत ने IPC की धारा 503 और 506 की व्याख्या की।
  • अस्पष्ट बयान: आरोपी वकील रोहित नागपाल पर आरोप था कि उसने महिला से कहा था— “अगर वह दोबारा कोर्ट आई, तो उसे बख्शा नहीं जाएगा।”
  • कोर्ट का रुख: जस्टिस बंसल ने कहा कि इस बयान से यह संकेत नहीं मिलता कि महिला के शरीर, प्रतिष्ठा या संपत्ति को किस तरह की चोट पहुँचाने की योजना थी। यह केवल एक “अस्पष्ट और अनिर्धारित” नाराजगी (Vague Outburst) थी, जो बहस के दौरान निकली।
  • प्रभाव का अभाव: ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे पता चले कि इस बयान के कारण महिला इतनी डर गई थी कि उसने अपने कानूनी रास्ते छोड़ दिए हों।

‘गंभीर चोट’ के आरोपों पर स्पष्टीकरण

  • याचिकाकर्ताओं ने वकीलों को धारा 325 (गंभीर चोट पहुँचाना) के तहत बरी किए जाने को भी चुनौती दी थी।
  • साक्ष्यों की कमी: महिला के पिता ने दावा किया था कि उनकी उंगली में फ्रैक्चर हुआ है, लेकिन वे यह नहीं बता सके कि यह चोट किसने पहुँचाई।
  • मेडिकल रिपोर्ट (MLC): कोर्ट ने पाया कि संबंधित डॉक्टरों का परीक्षण नहीं किया गया था और मेडिकल सर्टिफिकेट केवल रिकॉर्ड क्लर्क द्वारा पेश किए गए थे। साक्ष्यों के अभाव में गंभीर चोट के आरोप साबित नहीं हो सके।

समय का बीत जाना (Incidents of 2010)

  • कोर्ट ने अपने फैसले में समय के महत्व को भी रेखांकित किया।
  • 16 साल का अंतराल: घटना 2010 की है और अब हम 2026 में हैं। इस लंबी अवधि में आरोपियों के खिलाफ शांति भंग करने या किसी अन्य समान मामले में शामिल होने की कोई शिकायत नहीं मिली है।
  • शांति का माहौल: कोर्ट ने माना कि इतने पुराने और सामान्य विवाद को अब और खींचना न्यायसंगत नहीं है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणतथ्य
घटना की तिथि28 जनवरी, 2010।
स्थानतीस हजारी कोर्ट, दिल्ली।
विवाद का कारणवैवाहिक मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों और याचिकाकर्ताओं में झड़प।
मुख्य फैसलाअस्पष्ट बयानों को ‘आपराधिक धमकी’ नहीं माना जा सकता।
अंतिम आदेशतीन वकीलों (रोहित नागपाल, अरुण रेनू और दिलीप राणा) की रिहाई बरकरार।

आपराधिक धमकी के लिए सख्त मानक

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला उन मामलों के लिए नजीर है जहाँ तुच्छ बयानों या आपसी कहासुनी को गंभीर आपराधिक धाराओं में बदलने की कोशिश की जाती है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि गुस्से में कहे गए शब्दों और कानूनी रूप से ‘धमकी’ के बीच एक स्पष्ट अंतर है, और कानून केवल उन धमकियों को दंडित करता है जो वास्तविक भय पैदा करती हैं।

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