Monday, August 10, 2026
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Police Fraud: ऐसे शख्स को जानिए जो बिहार व झारखंड दोनों जगह नाम बदलकर कांस्टेबल की नौकरी कर रहा था…देखिए केस में क्या हुआ

Police Fraud: सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक रोजगार, विशेष रूप से पुलिस बल में, धोखाधड़ी का जरिया नहीं बन सकता।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणतथ्य
आरोपीरंजन कुमार (झारखंड) / संतोष कुमार (बिहार)।
मुख्य आरोपदोहरी नौकरी, पहचान छिपाना, फर्जी दस्तावेज और ड्यूटी से गायब रहना।
सुप्रीम कोर्ट का फैसलाबर्खास्तगी बहाल, आपराधिक केस दर्ज करने का आदेश।
न्यायाधीशजस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन।
कानूनी संदेशपुलिस बल में धोखाधड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

कांस्टेबल की बर्खास्तगी को बहाल कर दिया

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने आरोपी की दलीलों को खारिज करते हुए उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के भी निर्देश दिए हैं। अदालत ने झारखंड पुलिस के एक कांस्टेबल की बर्खास्तगी को बहाल कर दिया, जिस पर पहचान छिपाने (Impersonation), फर्जीवाड़ा और दो राज्यों में एक साथ नौकरी करने का आरोप था। यह मामला रंजन कुमार नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिसकी नियुक्ति 2005 में झारखंड पुलिस में हुई थी। यह मामला किसी फिल्म की पटकथा जैसा प्रतीत होता है, जहाँ एक ही व्यक्ति दो अलग-अलग पहचानों के साथ दो राज्यों की पुलिस में कार्यरत था।

धोखाधड़ी का पूरा घटनाक्रम

  • झारखंड पुलिस (रंजन कुमार): मई 2005 में नियुक्ति हुई। दिसंबर 2007 में दो दिन की छुट्टी ली, लेकिन वापस ड्यूटी पर नहीं लौटा और अनाधिकृत रूप से गायब हो गया।
  • बिहार पुलिस (संतोष कुमार): इसी गायब अवधि के दौरान, उसने ‘संतोष कुमार’ नाम से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बिहार पुलिस में कांस्टेबल की नौकरी हासिल कर ली। जनवरी 2008 में उसने वहां से भी ड्यूटी छोड़ दी।
  • खुलासा: बाद में जांच में पता चला कि ‘रंजन कुमार’ और ‘संतोष कुमार’ वास्तव में एक ही व्यक्ति हैं।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां

  • अदालत ने पुलिस बल में अनुशासन और ईमानदारी के महत्व को रेखांकित करते हुए टिप्पणी की।
  • शुचिता का अभाव: पुलिस बल के सदस्य से ईमानदारी और अनुशासन के उच्चतम स्तर की अपेक्षा की जाती है। यदि सेवा में प्रवेश ही धोखे से हुआ हो, तो यह सार्वजनिक रोजगार की जड़ों पर प्रहार करता है।
  • संस्थागत विश्वसनीयता: यदि कानून लागू करने वाले लोग स्वयं धोखाधड़ी से सेवा में आते हैं, तो यह कानून के शासन (Rule of Law) को गंभीर रूप से कमजोर करेगा। ऐसे व्यक्ति का सेवा में बने रहना संस्थान और जनता के विश्वास के लिए हानिकारक है।
  • सबूतों की प्रधानता: कोर्ट ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य केवल संदेह नहीं हैं, बल्कि यह दो ‘संप्रभु नियोक्ताओं’ (Sovereign Employers) को धोखा देने की एक सोची-समझी साजिश को स्थापित करते हैं।

विभाग बनाम आपराधिक कार्यवाही

  • आरोपी ने दलील दी थी कि जांच में कुछ गवाहों से पूछताछ नहीं की गई। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया।
  • विभागीय जांच बनाम ट्रायल: विभागीय जांच कोई आपराधिक ट्रायल नहीं है। यदि आरोपी को अपनी बात रखने का उचित अवसर दिया गया है और निष्कर्ष प्रासंगिक सामग्री पर आधारित हैं, तो अदालत हस्तक्षेप नहीं करेगी।
  • आपराधिक केस का निर्देश: कोर्ट ने बिहार और झारखंड के पुलिस महानिदेशकों (DGP) को निर्देश दिया कि वे इस मामले की जांच सक्षम प्राधिकारियों से कराएं और धोखाधड़ी, जालसाजी व पहचान छिपाने जैसे संज्ञेय अपराधों (Cognisable Offences) के लिए उचित कानूनी कदम उठाएं।

सेवा में ईमानदारी अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो फर्जीवाड़े के जरिए सरकारी तंत्र में घुसपैठ करने की कोशिश करते हैं। विशेष रूप से वर्दीधारी सेवाओं में, जहाँ ‘विश्वसनीयता’ ही सबसे बड़ा हथियार है, वहां धोखाधड़ी के लिए कोई जगह नहीं है।

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