Thursday, September 24, 2026
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Court Dignity: वकील कोर्ट का अधिकारी है, विरोधी नहीं…गुंडागर्दी और दबाव की राजनीति कोर्ट रूम में नहीं चलेगी, वकील को मिली यह नसीहत, पढ़ें

Court Dignity: मद्रास हाई कोर्ट जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया को “सद्भाव” के नाम पर दबाया नहीं जा सकता और अनुशासन ही बार-बेंच (Bar-Bench) संबंधों की असली बुनियाद है।

अदालत ने मदुरै की एक युवा न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate) के साहस और दृढ़ता की सराहना करते हुए उन वकीलों के खिलाफ कार्यवाही रोकने से इनकार कर दिया है, जिन्होंने अदालत की कार्यवाही में बाधा डाली थी। यह मामला जनवरी 2026 की एक घटना से जुड़ा है, जब मदुरै की एक स्थानीय अदालत में रिमांड की कार्यवाही के दौरान बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों सहित कई वकीलों ने कथित तौर पर जज पर दबाव बनाने और कार्यवाही रोकने की कोशिश की थी।

युवा मजिस्ट्रेट की सिद्धांतवादी दृढ़ता

  • जस्टिस विक्टोरिया गौरी ने मजिस्ट्रेट की प्रशंसा की।
  • सुविधा बनाम सिद्धांत: “इस मामले में अदालत एक ऐसी युवा न्यायिक अधिकारी की गवाह है, जिसने वकीलों की उम्र, कद या अनुभव की परवाह किए बिना सुविधा का रास्ता नहीं, बल्कि सिद्धांतों का रास्ता चुना।”
  • संस्थान की गरिमा: “जब माहौल तनावपूर्ण था और दबाव बनाया जा रहा था, तब वह पीछे नहीं हटीं और न ही चुप्पी साधी। जिसे कुछ लोग ‘जिद्दीपन’ कह सकते हैं, यह अदालत उसे ‘सिद्धांतवादी दृढ़ता’ (Principled Firmness) के रूप में देखती है।”

मामला क्या था?

  • घटना: जनवरी 2026 में, वकीलों के एक समूह ने रिमांड की सुनवाई के दौरान हस्तक्षेप किया, जिसके कारण जज को कुछ समय के लिए डायस (Bench) से उठकर जाना पड़ा।
  • कानूनी कार्रवाई: जज ने इन वकीलों के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 384 (अदालत के भीतर अपराधों पर त्वरित कार्रवाई) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 267 (न्यायिक कार्यवाही में लोक सेवक का अपमान या बाधा) के तहत मामला शुरू किया।
  • वकीलों का तर्क: वकीलों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इन कार्यवाहियों को रद्द (Quash) करने की मांग की थी। उन्होंने तर्क दिया कि यह केवल एक ‘गलतफहमी’ थी और सीसीटीवी फुटेज में कोई व्यवधान नहीं दिख रहा है।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख

  • अदालत ने वकीलों की याचिका खारिज करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं।
  • अनुशासन सर्वोपरि: न्याय वितरण प्रणाली बार और बेंच के बीच संदेह के माहौल में काम नहीं कर सकती। “सच्चा सद्भाव कदाचार पर चुप्पी साधने से नहीं, बल्कि सिद्धांतों की सीमाओं को बहाल करने से आता है।”
  • वकील की भूमिका: वकील अदालत का अधिकारी होता है, न कि उसका विरोधी। यदि बार संयम खोती है, तो संस्थान को नुकसान होता है।
  • रद्द करने की शक्ति: हाई कोर्ट ने दोहराया कि आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Powers) का उपयोग बहुत कम मामलों में किया जाना चाहिए, खासकर जहाँ तथ्यों और साक्ष्यों का विवाद हो।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणतथ्य
संबंधित न्यायाधीशमदुरै की एक युवा महिला न्यायिक मजिस्ट्रेट।
हाई कोर्ट का आदेशजस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी द्वारा (30 अप्रैल, 2026)।
आरोपवकीलों द्वारा न्यायिक कार्य में बाधा और अपमान।
कानूनी धाराएंBNSS 384 और BNS 267।
निष्कर्षवकीलों के खिलाफ कार्यवाही जारी रहेगी; जज की सराहना।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता

यह फैसला एक नजीर है कि चाहे वकील कितने भी अनुभवी या प्रभावशाली क्यों न हों, वे कानून से ऊपर नहीं हैं। मद्रास हाई कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि जमीनी स्तर (Lower Judiciary) पर काम करने वाले न्यायाधीशों को बिना किसी डर या दबाव के अपना कर्तव्य निभाने का पूरा अधिकार है।

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