Thursday, June 4, 2026
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TPDDL Office: RTI का जवाब नहीं दिया…CIC बोला-हमारा समय बर्बाद किया, पीआईओ की सैलरी से कटेगा जुर्माना, जानिए अवैध निर्माण का यह केस

TPDDL Office: सूचना का अधिकार (RTI) कानून के प्रति लापरवाही बरतने और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के आदेशों को हल्के में लेने वाले एक सरकारी अफसर को तगड़ा सबक मिला है।

सूचना आयुक्त विनोद कुमार तिवारी ने 1 जून 2026 को जारी अपने आदेश में अफसर को फटकार लगाते हुए कहा कि उसने आयोग के “मूल्यवान समय, ऊर्जा और संसाधनों” को बर्बाद किया है। आयोग ने एक जन सूचना अधिकारी (PIO) पर 1,000 रुपये का जुर्माना (Penalty) लगाया है, जिसे सीधे अधिकारी के वेतन (Salary) से काटने का आदेश दिया गया है।

क्या था मामला? (नारायणा गांव में अवैध निर्माण से जुड़ा विवाद)

यह मामला दिल्ली के नारायणा गांव (Naraina Village) से जुड़ा है, जहां एक नागरिक ने 25 जुलाई 2022 को एक ऑनलाइन RTI दाखिल की थी।

क्या मांगी थी जानकारी?: आवेदक ने कार्यकारी अभियंता (Executive Engineer) के कार्यालय और ‘टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रिब्यूशन लिमिटेड’ (TPDDL) के बीच उस पत्राचार (Communication) की प्रमाणित कॉपी मांगी थी, जो नारायणा गांव में अवैध निर्माणों के बिजली कनेक्शन काटने से संबंधित थी। इसके अलावा दिल्ली जल बोर्ड (DJB) के साथ पानी के कनेक्शन काटने को लेकर हुई बातचीत का ब्योरा भी मांगा गया था।

डेढ़ साल तक नहीं मिला जवाब: जब अधिकारी ने तय समय में कोई जवाब नहीं दिया, तो आवेदक ने अगस्त 2022 में प्रथम अपील दायर की। प्रथम अपीलीय प्राधिकरण (FAA) ने सितंबर 2022 में नाराजगी जताते हुए अधिकारी को 7 दिनों के भीतर जानकारी देने का आदेश दिया। इसके बावजूद आवेदक को ऑनलाइन पोर्टल पर सही जानकारी नहीं मिली, जिसके बाद मामला केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) पहुंचा।

सुनवाई में लापरवाही: खुद गायब रहे, जो आया उसे केस का पता ही नहीं था

इस मामले में 4 फरवरी 2025 को सीआईसी (CIC) के सामने सुनवाई हुई, जहां अफसर के रवैए ने आयोग को बेहद नाराज कर दिया।

अफसर खुद गायब थे: जन सूचना अधिकारी खुद सुनवाई में नहीं आए और अपनी जगह एक प्रतिनिधि (Representative) को भेज दिया।

अथॉरिटी लेटर पर नाम-पता ही नहीं: जो प्रतिनिधि आया, उसके पास जो अथॉरिटी लेटर था, उस पर किसी अज्ञात व्यक्ति के दस्तखत थे। उसमें न तो हस्ताक्षर करने वाले का नाम था, न पद (Designation) और न ही फोन नंबर।

प्रतिनिधि को केस की एबीसीडी भी नहीं पता थी: आयोग के सामने आया प्रतिनिधि मामले के तथ्यों से पूरी तरह अनजान था, जिससे आयोग को मामले की सुनवाई करने में गंभीर बाधा आई। इसके बाद आयोग ने अफसर को ‘कारण बताओ नोटिस’ (Show Cause Notice) जारी कर लिखित स्पष्टीकरण मांगा था।

अफसर का बहाना: फील्ड इंस्पेक्शन में व्यस्त था और स्टाफ की कमी थी

अफसर ने मार्च 2025 में लिखित जवाब दाखिल कर माफी मांगी और अजीबो-गरीब बहाने बनाए। उन्होंने कहा कि सुनवाई वाले दिन सुबह से ही वह ‘फील्ड इंस्पेक्शन’ (क्षेत्रीय निरीक्षण) में व्यस्त थे, इसलिए दफ्तर में अथॉरिटी लेटर साइन करने के लिए मौजूद नहीं थे। उनके बाद जो सबसे सीनियर अफसर थे, उन्होंने दस्तखत किए। उन्होंने यह दलील भी दी कि कार्यकारी अभियंता के दफ्तर में इंजीनियरों और क्लर्कों की भारी कमी है, इसलिए ‘कामचलाऊ व्यवस्था’ (Stopgap Arrangement) के तहत एक लिपिक (Clerical) स्टाफ को सुनवाई में भेज दिया गया था।

CIC का सख्त रुख: ऑनलाइन RTI का जवाब ‘ऑफलाइन’ क्यों दिया?

आयोग ने अफसर के बहानों को पूरी तरह खारिज कर दिया। सीआईसी ने नोट किया कि अफसर ने बाद में 24 अप्रैल 2026 को आवेदक को जवाब तो भेजा, लेकिन वह ऑफलाइन (स्पीड पोस्ट/कागज के जरिए) भेजा। आयोग ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा, जब यह RTI ऑनलाइन पोर्टल के जरिए दाखिल की गई थी, तो इसका जवाब ऑफलाइन मोड में क्यों दिया गया? इस भटकाव (Deviation) का कोई ठोस कारण नहीं बताया गया, जिससे RTI प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बेवजह अस्पष्टता पैदा होती है। आरटीआई कानून के तहत आयोग के सामने पेश होना एक वैधानिक जिम्मेदारी (Statutory Responsibility) है, इसे इस तरह कैजुअल या हल्के में नहीं लिया जा सकता।

आदेश: आयोग ने इस आचरण को नागरिक के अधिकारों को ‘कुचलने’ जैसा माना और अधिकारी के वेतन से 1,000 रुपये काटकर उसे केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (CAT) के पक्ष में जमा करने का निर्देश दिया।

विश्लेषण: सरकारी बाबुओं के लिए इस फैसले के मायने

इम्पैक्ट एरियासीआईसी का स्टैंड और इसके दूरगामी असर
ऑनलाइन पारदर्शितायह फैसला साफ करता है कि अगर कोई नागरिक ऑनलाइन RTI डालता है, तो उसका जवाब भी ऑनलाइन पोर्टल पर ही अपडेट होना चाहिए। ऑफलाइन जवाब देकर पल्ला झाड़ने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।
जवाबदेही तय होनाअक्सर बड़े अधिकारी खुद बचने के लिए अपने छोटे क्लर्कों को बिना तैयारी के कोर्ट या कमीशन में भेज देते हैं। अब ऐसा करने पर सीधे उनकी जेब (सैलरी) पर डाका पड़ेगा।
नागरिकों के समय की कीमतसरकारी विभागों में ‘स्टाफ की कमी है’ या ‘अधिकारी फील्ड में हैं’ जैसे घिसे-पिटे बहाने अब सूचना आयोग के सामने नहीं चलेंगे।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

केंद्रीय सूचना आयोग का यह फैसला उन सभी सरकारी अधिकारियों के लिए एक कड़ा अलार्म है जो आरटीआई को महज एक अतिरिक्त कागजी काम समझते हैं। सैलरी से पैसे कटने का यह आदेश यह साबित करता है कि कानून की नजर में जनता का समय और उसका जानने का अधिकार सर्वोपरि है, और किसी भी अफसर की ‘फील्ड विजिट’ संवैधानिक जवाबदेही से बड़ी नहीं हो सकती।

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