Professional Fees: मद्रास हाईकोर्ट ने पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के एक पूर्व पैनल वकील की अपील को खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश सुनाया है।
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मिलने वाली रिट एक असाधारण सार्वजनिक कानून उपाय (Public Law Remedy) है, जो संवैधानिक उल्लंघनों और प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ बनी है यह किसी व्यावसायिक या पेशेवर अनुबंध की वसूली का वैकल्पिक साधन नहीं है। कहा, वकील अपनी बकाया व्यावसायिक फीस वसूलने के लिए हाई कोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) का इस्तेमाल नहीं कर सकते। यदि किसी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (PSB) और वकील के बीच कानूनी सेवाओं में कमी या बिलों के भुगतान को लेकर कोई विवाद है, तो इसका निपटारा सिविल कोर्ट (Civil Court) में ही हो सकता है, न कि अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दाखिल करके।
मामला क्या है?: PNB के पूर्व वकील और बैंक के बीच फीस का विवाद
याचिकाकर्ता: एडवोकेट सुनीत कुमार अग्रवाल, जो पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के पूर्व एम्पेनल्ड काउंसिल (पैनल वकील) थे।
विवाद: उन्होंने बैंक से अपने बकाया पेशेवर शुल्क और खर्चों के भुगतान (शुरुआत में ₹6.80 लाख, जो अपील में बढ़कर ₹10 लाख हो गया) की मांग करते हुए हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।
यह रहे पक्ष-विपक्ष के तर्क
वकील का पक्ष: उन्होंने कई वर्षों तक बैंक को संतोषजनक सेवाएं दी हैं और उनकी देनदारी निर्विवाद है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि कुछ बैंक अधिकारियों ने बकाया बिल पास करने के लिए 40% कमीशन (रिश्वत) की मांग की थी।
PNB का पक्ष: बैंक ने कहा कि कुछ निर्विवाद बिलों का भुगतान किया जा चुका है, लेकिन बाकी दावों पर बैंक को आपत्ति है क्योंकि वकील द्वारा दी गई सेवाओं में कमियां (Deficiencies) थीं।
निचली अदालत का फैसला: अप्रैल 2024 में एकल पीठ (Single Judge) ने फीस विवाद में रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ यह अपील दायर की गई थी।
हाई कोर्ट के 3 मुख्य कानूनी निष्कर्ष (Legal Principles)
‘गलत न्यायिक दरवाजा खटखटाया’ (Knocked on the Wrong Judicial Door)
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता वकील ने गलत न्यायिक मंच का चुनाव किया है। जब कोई प्रतिवादी (बैंक) दी गई सेवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है, तो मामला सार्वजनिक कानून (Public Law) के दायरे से बाहर निकलकर निजी नागरिक दायित्वों (Private Civil Obligations) के क्षेत्र में आ जाता है।
अनुच्छेद 226 (Writ) का इस्तेमाल कब हो सकता है?
अदालत ने स्पष्ट किया कि संविदात्मक विवादों (Contractual Disputes) में रिट याचिका केवल तभी स्वीकार्य है जब देनदारी का पूर्ण और स्पष्ट स्वीकार (Unambiguous Admission of Liability) हो, तथा अनुच्छेद 14 के तहत राज्य/प्राधिकारी द्वारा अत्यधिक और चौंकाने वाली मनमानी (Shocking Arbitrariness) की गई हो। जहां रिश्वतखोरी के आरोप हों और सेवाओं में कमी के दावों पर सवाल हों, ऐसे विवादित तथ्यों (Disputed Questions of Fact) को रिट सुनवाई में तय नहीं किया जा सकता।
सिविल कोर्ट में ट्रायल ही एकमात्र रास्ता
अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों का उचित समाधान सिविल ट्रायल (Civil Trial) के जरिए ही संभव है, जहाँ दोनों पक्ष अपने दस्तावेज जमा कर सकें, गवाहों से जिरह (Cross-examination) कर सकें और साक्ष्यों के आधार पर सच्चाई सामने आ सके।
अदालत का अंतिम आदेश
मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ ने वकील की अपील खारिज करते हुए निर्देश जारी किए।
अपील खारिज: रिट क्षेत्राधिकार के तहत व्यावसायिक फीस की वसूली का दावा पोषणीय नहीं है।
सिविल कोर्ट जाने की छूट: वकील को सक्षम सिविल कोर्ट या उपयुक्त फोरम के समक्ष मुकदमा दायर करने की स्वतंत्रता दी गई।
समय-सीमा (Limitation Period) में छूट: कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि वकील सिविल सूट दायर करते हैं, तो रिट याचिका और अपील में बिताए गए समय को परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) की गणना से बाहर रखा जाएगा। मामले में याचिकाकर्ता व्यक्तिगत रूप से पेश हुए, जबकि PNB की ओर से टी.एस. गोपालन एंड कंपनी के एडवोकेट पी. रघुनाथ ने पैरवी की।
केस मैट्रिक्स: मद्रास हाई कोर्ट का फैसला
| कानूनी और प्रक्रियात्मक बिंदु | अदालत द्वारा तय की गई स्थिति |
| मामले का नाम | सुनीत कुमार अग्रवाल बनाम एजीएम, पीएनबी (Sunit Kumar Agarwal Vs AGM, PNB) |
| माननीय पीठ | मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी एवं जस्टिस जी. अरुल मुरुगन |
| मूल विधिक मुद्दा | क्या वकील बैंक से बकाया व्यावसायिक फीस वसूलने के लिए रिट याचिका (Art. 226) दायर कर सकता है? |
| अदालत का निर्णय | नहीं। संविदात्मक और सेवा-कमी के विवादों का निपटारा केवल सिविल सूट (Trial) के जरिए हो सकता है। |
| याचिकाकर्ता को राहत | सिविल कोर्ट जाने की छूट और रिट में लगे समय की परिसीमा (Limitation) से छूट। |

