Plea of Alibi: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 4 साल की बच्ची से दुष्कर्म के आरोप में 20 साल की सजा काट रहे 80 वर्षीय वृद्ध स्वामीदीन को बरी कर दिया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस संतोष राय की एकल पीठ ने हमीरपुर की विशेष पॉक्सो अदालत द्वारा दिसंबर 2025 में दी गई सजा के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि निचली अदालत आरोपी के अन्यत्र उपस्थिति के प्रमाण (Plea of Alibi) और चिकित्सकीय साक्ष्यों पर उचित ध्यान देने में विफल रही। कोर्ट ने पाया कि घटना के दिन आरोपी अपराध स्थल से लगभग 150 किलोमीटर दूर चित्रकूट के एक आई अस्पताल में अपनी आंखों का इलाज करा रहा था।
मामले का पृष्ठभूमि: 2021 की घटना और FIR में देरी
आरोप: घटना 5 दिसंबर 2021 की बताई गई थी। पीड़िता की मां द्वारा दर्ज FIR के अनुसार, स्वामीदीन ने टॉफी का लालच देकर 4 वर्षीय बच्ची को अपने घर बुलाया और उसके साथ अश्लील हरकत की।
FIR में 5 दिन का विलंब: घटना के 5 दिन बाद (10 दिसंबर 2021 को) FIR दर्ज कराई गई थी।
धाराओं का बदलाव: शुरुआत में पुलिस ने IPC की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) और POCSO एक्ट की धारा 10 में मामला दर्ज किया था। हालांकि, बाद में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को धारा 6 (Penetrative Sexual Assault) के तहत दोषी ठहराते हुए 20 साल कारावास की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट के बरी करने के 4 मुख्य आधार
‘अन्यत्र उपस्थिति’ (Plea of Alibi) का पुख्ता सबूत
आरोपी की ओर से बचाव में सद्गुरु नेत्र चिकित्सालय, चित्रकूट के OPD पंजीकरण कार्ड (दिनांक 05.12.2021) और अन्य मेडिकल कागजात पेश किए गए। इसके अलावा बचाव पक्ष के गवाहों (DW-1 और DW-2) ने भी पुष्टि की।
हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणी: बचाव पक्ष द्वारा प्रस्तुत मेडिकल दस्तावेज और गवाहों के बयान यह साबित करते हैं कि कथित घटना की तारीख को अपीलकर्ता चित्रकूट में अपनी आंखों का इलाज करा रहा था और घटना स्थल से दूर था। इस तथ्य का अभियोजन पक्ष के पास कोई जवाब नहीं था।
मेडिकल रिपोर्ट पूरी तरह ‘न्यूट्रल’
अदालत ने पाया कि बच्ची के मेडिकल परीक्षण (Internal Genital Examination) में हाइमन (Hymen) सामान्य पाया गया और कोई चोट या सूजन के निशान नहीं थे। यद्यपि चोट न होना पॉक्सो मामले को खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता, लेकिन जब चश्मदीद गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास हो, तो मेडिकल साक्ष्य का यह ‘न्यूट्रल’ होना आरोपी के पक्ष में जाता है।
FIR में देरी और धाराओं में बदलाव
हाई कोर्ट ने कहा कि FIR में 5 दिनों की देरी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया था। इसके अतिरिक्त, मूल FIR में केवल छेड़छाड़ (Outraging Modesty) का उल्लेख था, न कि पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट का।
पीड़िता को ‘सिखाने’ (Tutored Witness) की संभावना
अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता (मां) के बयानों में कई भौतिक विरोधाभास हैं। घटना के समय पीड़िता 4 साल की थी और ट्रायल के दौरान बयान देते समय 6 साल की। वह लगातार अपनी मां के साथ रही, जिससे उसे सिखाए-पढ़ाये (Tutor) जाने की प्रबल संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
केस मैट्रिक्स: Swamideen v. State of U.P.
| विधिक और प्रक्रियात्मक पहलू | विवरण / हाई कोर्ट का फैसला |
| मामले का नाम | स्वामीदीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Swamideen v. State of UP) |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| माननीय पीठ | जस्टिस संतोष राय (Justice Santosh Rai) |
| मुख्य बचाव का आधार | Plea of Alibi (घटना के वक्त 150 किमी दूर अस्पताल में भर्ती होना) |
| अदालत का निर्णय | निचली अदालत का सजा का आदेश रद्द; आरोपी संदेह के लाभ (Benefit of Doubt) पर बरी। |

