Penetrative Assault: बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों और पोक्सो (POCSO) कानून की व्याख्या को लेकर उड़ीसा हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट के डॉ. जस्टिस संजीब कुमार पाणिग्राही की एकल पीठ ने कटक की विशेष पोक्सो कोर्ट द्वारा आरोपी को दी गई सजा को पूरी तरह बरकरार (Affirm) रखते हुए यह ऐतिहासिक टिप्पणी की। कहा, यह अदालत पाती है कि आरोपी का आचरण—यानी पीड़िता को जबरन खींचना, उसे चूमना और उसकी पैंट के अंदर अपना हाथ डालना—साफ तौर पर ‘यौन इरादे’ (Sexual Intent) के साथ किए गए शारीरिक संपर्क को दर्शाता है। यह पोक्सो एक्ट की धारा 7 के तहत परिभाषित ‘यौन हमले’ के दायरे में पूरी तरह फिट बैठता है। पीड़िता की उम्र को देखते हुए, ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को धारा 10 (गंभीर यौन हमले) के तहत दोषी ठहराने के फैसले में कोई कानूनी खामी नहीं है।
यह किया गया निर्णय में स्पष्ट
अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई आरोपी किसी नाबालिग बच्ची की पैंट के अंदर अपना हाथ डालता है, तो भले ही बच्ची के निजी अंग में उंगली डालने (Penetration) का कोई मेडिकल या कानूनी सबूत न मिले, फिर भी उसका यह कृत्य पोक्सो एक्ट की धारा 7 के तहत ‘यौन हमला’ (Sexual Assault) के दायरे में ही आएगा।
मामला क्या था? (चाय बनाने के बहाने घर में घुसकर मासूम से दरिंदगी)
यह घिनौनी घटना 9 जुलाई 2023 की है, जिसके कानूनी तथ्य इस प्रकार हैं।
घटनाक्रम: आरोपी (जो पेशे से मिक्सी/ग्राइंडर मैकेनिक था) पीड़िता की मां के जेठ के घर आया था, जहां पीड़ित बच्ची और उसकी बहन खेल रही थीं। आरोपी ने बच्ची की ताई से चाय बनाने के लिए कहा। जैसे ही वह रसोई में गईं, आरोपी घर के अंदर घुस गया। उसने मासूम बच्ची को अपने पास बुलाया, उसे जबरन गाल और होठों पर चूमा और उसकी पैंट के अंदर हाथ डाल दिया। बच्ची किसी तरह उसके चंगुल से छूटकर छिपी, जिसके बाद आरोपी वहां से भाग निकला।
शुरुआती गंभीर धाराएं: पुलिस ने शुरुआत में आरोपी के खिलाफ घर में जबरन घुसने (Sec 452 IPC), 12 साल से कम उम्र की बच्ची से दुष्कर्म (Sec 376(AB) IPC) और पोक्सो एक्ट की धारा ६ (गंभीर मर्मभेदी यौन हमला – Aggravated Penetrative Sexual Assault) के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।
क्यों हटीं ‘रेप’ की धाराएं? (ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट का कानूनी विश्लेषण)
मामले की कड़ियों को जोड़ते हुए हाई कोर्ट ने नोट किया कि निचली अदालत ने आरोपी को ‘रेप’ (धारा 376AB IPC) और ‘गंभीर मर्मभेदी यौन हमले’ (धारा 6 POCSO) के आरोपों से बरी कर दिया था। इसके पीछे मुख्य कारण थे:
बयानों में विरोधाभास: पीड़िता ने धारा 164 CrPC के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए गए अपने बयान में निजी अंग के भीतर उंगली डालने (Penetration) का कोई जिक्र नहीं किया था।
मेडिकल रिपोर्ट: मेडिकल जांच में बच्ची के गुप्त अंग पर किसी भी तरह की बाहरी या आंतरिक चोट (External Injury) के निशान नहीं मिले थे।
जस्टिस पाणिग्राही ने इस कानूनी बारीकी पर मुहर लगाते हुए कहा, “ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए धारा 376(AB) और धारा 6 पोक्सो से बरी करना पूरी तरह सही था। लेकिन, केवल इसलिए कि मर्मभेदी यौन हमला (Penetrative Assault) साबित नहीं हो सका, पीड़िता की उन लगातार और सुसंगत गवाहियों को खारिज नहीं किया जा सकता, जिसमें उसने आरोपी द्वारा खींचे जाने, चूमने और पैंट में हाथ डालने की बात कही है।”
विश्लेषण: ‘यौन हमला’ बनाम ‘गंभीर यौन हमला’ (POCSO Act)
उड़ीसा हाई कोर्ट का यह फैसला साफ करता है कि पोक्सो कानून के तहत किसी बच्चे के साथ यौन इरादे से किया गया कोई भी अवांछित शारीरिक संपर्क (Physical Contact) अपने आप में एक गंभीर अपराध है, चाहे उसकी तीव्रता कितनी भी हो।
| कानूनी पहलू और आरोपी की दलीलें | हाई कोर्ट की व्याख्या और कानूनी स्थिति |
| पीड़िता की उम्र (Age of Victim) | सीएमसी नियाली (कटक) के जन्म एवं मृत्यु रजिस्ट्रार द्वारा जारी प्रमाण पत्र के अनुसार बच्ची की जन्मतिथि 1 नवंबर 2014 थी, जिससे साबित हुआ कि घटना के समय बच्ची 12 वर्ष से कम उम्र की थी। |
| पहचान परेड (TIP) न होना | आरोपी ने दलील दी कि पुलिस ने उसकी शिनाख्त के लिए ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ नहीं कराई। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि चूंकि गवाह और परिवार आरोपी को पहले से जानते थे (मैकेनिक होने के नाते), इसलिए टीआई परेड न होना केस के लिए घातक नहीं है। |
| धारा 7 और 10 पोक्सो का मेल | चूंकि बच्ची की उम्र 12 साल से कम थी, इसलिए धारा 7 (यौन हमला) का अपराध स्वतः ही धारा 10 पोक्सो (Punishment for Aggravated Sexual Assault) के तहत ‘गंभीर यौन हमले’ में बदल गया, जिसमें कड़ी सजा का प्रावधान है। |
हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
उड़ीसा हाई कोर्ट ने आरोपी की आपराधिक अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया। आरोपी को आईपीसी की धारा 452 (घर में जबरन घुसना), 354 (महिला की लज्जा भंग करना), 354-ए (यौन उत्पीड़न) और पोक्सो एक्ट की धारा 10 और 12 के तहत दी गई जेल की सजा और जुर्माने को बरकरार रखा गया है।

