Investment Fraud: देश में तेजी से पैर पसार रहे डिजिटल और वित्तीय साइबर अपराधों के खिलाफ उच्चतम न्यायालय ने बेहद सख्त विधिक और मानवीय रुख अपनाया है।
आरोपी को कोई भी विधिक राहत देने से साफ इनकार
निवेश धोखाधड़ी (Investment Fraud) और मनी लॉन्ड्रिंग के एक आरोपी की याचिका को शुरुआती स्तर पर ही खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्य कांत ने साइबर अपराधियों की तुलना ‘परजीवियों’ से की। अदालत ने स्पष्ट किया कि भोले-भाले निवेशकों की जीवनभर की गाढ़ी कमाई लूटने वाले अपराधियों के खिलाफ देश की न्यायपालिका को बेहद कठोर (Harsh) रुख अपनाना होगा। सीजेआई सूर्य कांत और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने मनोज कुमार सिंह नामक आरोपी द्वारा बिहार राज्य व अन्य के खिलाफ दायर एक रिट याचिका (Writ Petition) पर सुनवाई करते हुए यह तीखी मौखिक टिप्पणियां कीं। अदालत ने आरोपी को कोई भी विधिक राहत देने से साफ इनकार कर दिया।
साइबर अपराधों के अखिल भारतीय नेटवर्क
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने साइबर अपराधों के अखिल भारतीय नेटवर्क (Pan-India Network) पर प्रहार करते हुए कहा, आप सभी समाज के परजीवी (Parasites) हैं। आप मासूम निवेशकों से पैसा ऐंठते हैं और उन्हें धोखा देते हैं। हमें साइबर अपराधियों के प्रति सख्त होना ही होगा। समाज का हित और भलाई केवल इसी बात में है कि आप जैसे लोग सलाखों के पीछे (Behind Bars) रहें। इस तरह के अपराध हमेशा अखिल भारतीय स्तर के होते हैं कभी गुजरात में किसी से पैसा ठगा, तो कभी मुंबई में, और फिर कहीं और।
पृष्ठभूमि: डिजिटल अरेस्ट और साइबर महामारी पर सुप्रीम कोर्ट का ‘सुओ मोटो’ एक्शन
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की पीठ द्वारा व्यक्त की गई यह चिंता देश में चल रहे एक बड़े विधिक अभियान का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट इस समय देश में बढ़ रहे साइबर अपराधों की बाढ़ को लेकर बेहद गंभीर है।
अक्टूबर 2025 का स्वतः संज्ञान (Suo Motu Case): उच्चतम न्यायालय ने इस गंभीर विधिक संकट पर अक्टूबर 2025 में खुद ही एक स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (PIL) दर्ज की थी। यह मामला हरियाणा के अंबाला की एक 73 वर्षीय बुजुर्ग महिला की शिकायत से शुरू हुआ था, जिसे साइबर ठगों ने सुप्रीम कोर्ट के ही जाली आदेशों (Forged Court Orders) का डर दिखाकर ‘डिजिटल अरेस्ट’ किया था और ₹1 करोड़ से अधिक की रंगदारी वसूली थी।
सीबीआई को देशव्यापी जांच का जिम्मा (दिसंबर 2025): सीजेआई की अगुवाई वाली पीठ ने दिसंबर 2025 में एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को देशव्यापी डिजिटल अरेस्ट घोटालों की कमान सौंपी थी।
राज्यों के क्षेत्राधिकार की बाधाएं दूर करना: कोर्ट ने पंजाब, तमिलनाडु, उत्तराखंड और हरियाणा जैसे राज्यों को निर्देश दिया था कि वे सीबीआई जांच के लिए अपनी अनिवार्य विधिक सहमति (General Consent) तुरंत प्रदान करें, ताकि राज्यों की सीमाओं और बंटे हुए क्षेत्राधिकार (Fragmented Jurisdiction) का फायदा उठाकर अपराधी बच न सकें।
असाधारण विधिक आदेश (नवंबर 2025): इससे पहले, नवंबर 2025 में जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमालय बागची की पीठ ने एक 72 वर्षीय वकील से ₹3.29 करोड़ की ठगी करने वाले डिजिटल अरेस्ट गैंग के आरोपियों को देश की किसी भी अदालत द्वारा जमानत दिए जाने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। कोर्ट ने माना था कि ऐसी असाधारण परिस्थितियों में “असाधारण विधिक आदेशों” (Unusual Orders) की आवश्यकता होती है।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक बिंदु | उच्चतम न्यायालय का विधिक रुख और आदेश (जून 2026) |
| याचिकाकर्ता | मनोज कुमार सिंह (निवेश धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग का आरोपी)। |
| प्रतिवादी पक्ष | बिहार राज्य एवं अन्य। |
| पीठ (Coram) | भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस वी. मोहना। |
| अपराध की प्रकृति | पैन-इंडिया साइबर निवेश धोखाधड़ी (विभिन्न राज्यों के नागरिकों से ठगी)। |
| अदालत का अंतिम आदेश | रिट याचिका पूरी तरह खारिज। आरोपी को राहत के लिए संबंधित हाई कोर्ट जाने का निर्देश। |
| सर्वोच्च विधिक नीति | साइबर वित्तीय अपराधियों के खिलाफ ‘नो टॉलरेंस’ (जेल ही एकमात्र स्थान है)। |

