Misogynistic Matter: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के सम्मान, अनुशासन और कर्मचारियों के आचरण को लेकर एक कड़ा और महत्वपूर्ण विधिक निर्णय सुनाया है।
ठाणे की औद्योगिक अदालत के पुराने फैसले को पलट दिया
हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप वी. मारने की एकल पीठ ने ‘उत्तन मछिमार एंड वाहतुक सहकारी सोसायटी लिमिटेड’ द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने ठाणे की औद्योगिक अदालत (Industrial Court, Thane) के वर्ष 2021 के उस आदेश को पूरी तरह पलट दिया, जिसने ड्राइवर की बर्खास्तगी को अवैध माना था और उसे पुनर्बहाली के बदले ₹5 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया था। हाई कोर्ट ने श्रम न्यायालय (Labour Court) के मूल फैसले को बहाल करते हुए ड्राइवर की बर्खास्तगी को वैध माना।
आरोपी ड्राइवर को नौकरी से निकालने का फैसला सही
अदालत ने कोली (मछुआरा) समुदाय की महिलाओं के खिलाफ अत्यंत अश्लील, अपमानजनक और महिला-विरोधी (Misogynistic) टिप्पणियां करने के आरोपी एक ड्राइवर को नौकरी से निकालने (Sacking) के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया है। इसके साथ ही, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसे गंभीर कदाचार (Grave Misconduct) के दोषी कर्मचारी को किसी भी प्रकार का वित्तीय मुआवजा पाने का कोई विधिक अधिकार नहीं है।
यह रही न्यायालय की टिप्पणी
न्यायालय ने कर्मचारी के आचरण और सामाजिक मानसिकता पर तीखी टिप्पणी करते हुए अपने विधिक निष्कर्ष में कहा, एक कर्मचारी जिसने संस्था के उपाध्यक्ष के साथ असंसदीय और अभद्र भाषा का प्रयोग किया हो और जो अनुशासनहीन हो चुका हो, उसे मुआवजे से पुरस्कृत नहीं किया जा सकता। उसके द्वारा की गई टिप्पणियां उस समुदाय के प्रति उसकी दूषित मानसिकता को दर्शाती हैं, जिसके कल्याण के लिए उसे नौकरी पर रखा गया था। संस्था में अनुशासन बनाए रखने के लिए ऐसी प्रवृत्तियों से लोहे के हाथों (Iron Hands) से निपटने की आवश्यकता है।
मामला क्या था? (2006 की घटना और जांच अधिकारी को धमकी)
यह विधिक विवाद करीब दो दशक पुराना है, जो एक मछुआरा सहकारी समिति और उसके पूर्व ड्राइवर के बीच के गतिरोध से जुड़ा है।
विवाद की पृष्ठभूमि: नितिन जयवंत म्हात्रे ‘उत्तन मछिमार एंड वाहतुक सहकारी सोसायटी’ में ड्राइवर के पद पर तैनात था। अक्टूबर 2006 में उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी, जिसमें तीन अलग-अलग घटनाओं का जिक्र था। जनवरी 2007 में घरेलू जांच (Domestic Enquiry) पूरी न हो पाने के बाद उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। आरोप था कि उसने जांच अधिकारी (Enquiry Officer) को ही डराया-धमकाया और आतंक का माहौल पैदा कर दिया था।
14 अक्टूबर 2006 की रात की घटना: चार्जशीट के अनुसार, सबसे गंभीर घटना 14 अक्टूबर 2006 की देर रात हुई। जब सोसायटी के उपाध्यक्ष एक अन्य ड्राइवर को दिशा-निर्देश दे रहे थे, तब म्हात्रे ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए गाली-गलौज शुरू कर दी। उसने सोसायटी के कार्यालय में मौजूद महिला सदस्यों के सामने ही कोली मछुआरों की पत्नियों और बेटियों के खिलाफ अत्यंत आपत्तिजनक और यौन रूप से स्पष्ट (Sexually Explicit) टिप्पणियां की थीं।
निचली अदालतों का विरोधाभास और हाई कोर्ट का विधिक हस्तक्षेप
इस मामले में विधिक अदालतों के बीच अलग-अलग व्याख्याएं देखने को मिलीं, जिसे हाई कोर्ट ने दुरुस्त किया।
लेबर कोर्ट और इंडस्ट्रियल कोर्ट के फैसलों में अंतर
शुरुआत में श्रम न्यायालय (Labour Court) ने उपाध्यक्ष और अन्य गवाहों के बयानों के आधार पर 14 अक्टूबर की घटना को पूरी तरह सच पाया था और बर्खास्तगी को सही माना था। हालांकि, जब मामला औद्योगिक अदालत (Industrial Court) के पास पुनरीक्षण (Revision) के लिए गया, तो उसने तकनीकी आधार पर (जैसे कि 16 अक्टूबर के शुरुआती मेमो में अभद्र भाषा का विशिष्ट संदर्भ न होना या तुरंत पुलिस शिकायत न होना) लेबर कोर्ट का फैसला पलट दिया और ड्राइवर के पक्ष में ₹5 लाख का मुआवजा तय कर दिया।
हाई कोर्ट द्वारा औद्योगिक अदालत को फटकार
जस्टिस संदीप वी. मारने ने स्पष्ट किया कि औद्योगिक अदालत ने गवाहों के बयानों और सबूतों का पुन: मूल्यांकन (Re-appreciation of evidence) करके अपने पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार (Revisional Jurisdiction) की विधिक सीमाओं को पार किया था।
‘लोहे के हाथों’ से निपटने की जरूरत
हाई कोर्ट ने नोट किया कि म्हात्रे कार्यालय में ‘आतंक का तत्व’ बन चुका था। अदालत ने कहा कि जब कोई व्यक्ति उसी समुदाय की महिलाओं का अपमान करता है जिनकी सेवा के लिए उसे नियुक्त किया गया है, तो उसकी बर्खास्तगी पूरी तरह न्यायसंगत है।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक बिंदु | बॉम्बे उच्च न्यायालय का अंतिम विधिक निर्णय (जून 2026) |
| याचिकाकर्ता (सोसायटी) | उत्तन मछिमार एंड वाहतुक सहकारी सोसायटी लिमिटेड। |
| प्रतिवादी (कर्मचारी) | नितिन जयवंत म्हात्रे (पूर्व ड्राइवर)। |
| मुख्य कानूनी आरोप | कोली समुदाय की महिलाओं के खिलाफ अश्लील, अपमानजनक भाषा का प्रयोग और वरिष्ठों से दुर्व्यवहार। |
| विधिक क्षेत्राधिकार का उल्लंघन | इंडस्ट्रियल कोर्ट ने लेबर कोर्ट के स्थापित तथ्यों को तकनीकी आधार पर बदलकर विधिक भूल की थी। |
| हाई कोर्ट का अंतिम आदेश | इंडस्ट्रियल कोर्ट का 2021 का आदेश रद्द; ड्राइवर की बिना मुआवजे के तत्काल बर्खास्तगी का फैसला बहाल। |

