Judicial Process: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों, बच्चों की कस्टडी (Abode/Custody) और मुलाकात के अधिकारों (Visitation Rights) को लेकर एक बेहद संवेदनशील और युगांतकारी विधिक व्यवस्था दी है।
यौन उत्पीड़न की शिकार बच्चियों की कस्टडी से जुड़ा मामला
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि कई बार खुद कानूनी प्रक्रिया (Judicial Process) ही पीड़ित बच्चे के लिए मानसिक प्रताड़ना और नए आघात (Trauma) का कारण बन जाती है। ऐसे में अदालतों को माता-पिता के आपसी विवादों से ऊपर उठकर बच्चे की मानसिक और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। शीर्ष अदालत ने कहा है कि यौन उत्पीड़न की शिकार (Alleged Victim of Sexual Abuse) मासूम बच्चियों या बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में भी अदालतों को यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 के उन बुनियादी विधिक सिद्धांतों का पालन करना चाहिए, जो बच्चों को मानसिक आघात से बचाने के लिए बनाए गए हैं।
पोक्सो (POCSO) एक्ट के विधिक सिद्धांतों का संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि पोक्सो अधिनियम केवल अपराधियों को सजा देने के लिए नहीं है, बल्कि कानूनी प्रक्रिया में शामिल होने वाले बच्चों की गरिमा, भावनात्मक अखंडता और मानसिक कल्याण की रक्षा के लिए भी है। कोर्ट ने अधिनियम की चार मुख्य धाराओं का विशेष रूप से उल्लेख किया जो ‘न्यूनतम जोखिम और न्यूनतम आघात’ (Minimum Exposure and Minimum Re-traumatisation) के विधिक सिद्धांत पर आधारित हैं।
धारा 24: पुलिस को बच्चे का बयान उसके अनुकूल माहौल में और यथासंभव महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज करने का निर्देश देती है।
धारा 33(5): विशेष अदालतों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देती है कि बच्चे को गवाही के लिए बार-बार अदालत न बुलाया जाए।
धारा 36: गवाही दर्ज करते समय यह सुनिश्चित करती है कि बच्चे का सामना आरोपी से न हो।
धारा 39: मानसिक आघात को कम करने के लिए अनुवादकों, विशेष शिक्षकों, विशेषज्ञों और सहायक व्यक्तियों (Support Persons) की सहायता का प्रावधान करती है।
सुप्रीम कोर्ट का विधिक रुख: हालांकि ये प्रावधान मुख्य रूप से आपराधिक मुकदमों (Criminal Trials) के लिए हैं, लेकिन जब किसी कस्टडी या विज़िटेशन विवाद में शामिल बच्चा पहले से ही किसी यौन शोषण का कथित शिकार हो, तो ये सिद्धांत दीवानी/पारिवारिक अदालतों (Family Courts) के लिए भी विधिक मार्गदर्शक (Doctrinal Guidance) होने चाहिए।
कोर्ट की तीखी टिप्पणी: ‘न्याय प्रणाली बच्चों को फॉरेंसिक जांच की वस्तु न बनाए’
कस्टडी विवादों में बच्चों के बार-बार होने वाले मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन (Psychological Evaluation) और अदालती पूछताछ पर पीठ ने गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा:
माता-पिता की विधिक खींचतान और मासूमों का मानसिक उत्पीड़न
अदालत ने कहा कि हमें ‘थेरेप्यूटिक जुड़ाव’ (चिकित्सीय सहायता, जो बच्चे के मानसिक सुधार के लिए जरूरी है) और ‘मूल्यांकन कसरत’ (जो माता-पिता के मुकदमों को जीतने के लिए अदालती जांच का हिस्सा होती है) के बीच अंतर करना होगा। अदालती मूल्यांकन की यह प्रक्रिया बच्चे को एक ऐसी ‘फॉरेंसिक जांच की वस्तु’ (Object of continuous forensic scrutiny) में बदल देती है, जिसका उद्देश्य केवल लड़ रहे माता-पिता के दावों को संतुष्ट करना होता है। इस कानूनी खींचतान (Legal Tug of War) में वह मासूम बच्चा अनजाने में ही शिकार बन जाता है। न्याय प्रणाली को ऐसी किसी भी प्रक्रिया से बचना होगा जो माता-पिता के विरोधी दावों को बच्चे की भावनात्मक सुरक्षा से ऊपर रखती हो।
बच्चे का सर्वोत्तम हित केवल कस्टडी तय करने तक सीमित नहीं
अदालत ने ‘चाइल्ड्स बेस्ट इंटरेस्ट’ (Child’s Best Interest) के विधिक सिद्धांत को व्यापक रूप से परिभाषित करते हुए कहा कि यह सिद्धांत केवल इस बात पर लागू नहीं होता कि अंत में बच्चा किसे सौंपा जाए। बल्कि यह इस बात पर भी पूरी तरह लागू होता है कि मुकदमे की पेंडेंसी (Pendency) के दौरान अदालतें उस बच्चे के साथ किस तरह का व्यवहार और प्रक्रिया अपनाती हैं। अदालती प्रक्रियाओं को संवेदनशील, न्यूनतम दखलंदाजी (Minimum Intrusion) और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा के मानकों के अनुरूप होना ही चाहिए।
अदालत का अंतिम विधिक निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय ने अंतिम रूप से यह विधिक सिद्धांत स्थापित किया कि किसी भी पीड़ित या संवेदनशील बच्चे के साथ अदालती बातचीत हमेशा न्यूनतम दखलंदाजी और न्यूनतम प्रदर्शन (Minimum Exposure) के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होनी चाहिए। अदालतों का यह परम कर्तव्य है कि वे यह सुनिश्चित करें कि बच्चे का कल्याण और उसका मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य ही पूरी कानूनी प्रक्रिया में सर्वोपरि विचार (Paramount Consideration) बना रहे।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक/मुख्य बिंदु | सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक विधिक सिद्धांत (जून 2026) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह। |
| मूल विधिक विषय | बाल पीड़ितों से जुड़े कस्टडी और गार्जियनशिप मुकदमों में पोक्सो सिद्धांतों की प्रासंगिकता। |
| चिंता का मुख्य कारण | माता-पिता के आपसी झगड़ों में अदालतों द्वारा बच्चे का बार-बार मनोवैज्ञानिक परीक्षण और पूछताछ कराना। |
| प्रतिपादित विधिक सिद्धांत | Doctrine of Minimum Re-traumatisation — विधिक प्रक्रियाओं के कारण बच्चा दोबारा मानसिक आघात का शिकार नहीं होना चाहिए। |
| पारिवारिक अदालतों को निर्देश | कस्टडी और मुलाकाती अधिकारों को तय करते समय केवल एडवर्सरी दावों को न देखें, बच्चे की मनोवैज्ञानिक सुरक्षा को प्राथमिकता दें। |

