Public Money: सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (Public Sector Banks) द्वारा बड़े-बड़े लोन एनपीए (NPA) होने के बाद एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों (ARCs) को बेहद मामूली कीमत पर ट्रांसफर किए जाने की विधा पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहाना की पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि कर्जदारों, बैंकों और एआरसी के बीच एक “बेहद गहरा और संस्थागत सांठगांठ” (Deep-rooted Nexus) दिखाई देता है, जिसकी व्यापक विधिक जांच होना नितांत आवश्यक है। शीर्ष अदालत ने सार्वजनिक धन (Public Money) और करदाताओं के पैसे (Taxpayers’ Money) की इस तरह होने वाली बर्बादी पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
सुप्रीम कोर्ट की तल्ख विधिक टिप्पणियां (The Over-Clever Device)
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने बैंकों की कार्यप्रणाली और एआरसी के विधिक ढांचे पर कई गंभीर सवाल खड़े किए।
जनता का पैसा निजी हाथों में और वो ऐश कर रहे हैं
सीजेआई ने साफ किया कि अगर यह किसी निजी क्रेडिटर या निजी बैंक का मामला होता, तो कोर्ट उसमें हस्तक्षेप नहीं करता। लेकिन यहां मामला आम जनता के पैसे का है। कहा, ये एआरसी भी बैंकों के साथ मिले हुए हैं। कर्जदार, एआरसी और बैंकरों के बीच एक गहरा गठजोड़ है। जनता का पैसा, जिसे लोगों के कल्याण के लिए खर्च किया जाना चाहिए था, निजी हाथों में चला गया, उसका दुरुपयोग किया गया, उसे डाइवर्ट (Siphoned) किया गया और अंत में वे (डिफॉल्टर्स) मजे कर रहे हैं—चिंता इसी बात की है।
बैंकों की “अति-चालाकी भरी तरकीब” (Over-Clever Device)
कोर्ट ने बैंकों द्वारा लोन एआरसी को ट्रांसफर करने की टाइमिंग और प्रक्रिया को एक “अति-चालाकी भरी तरकीब” करार दिया। सीजेआई ने कहा, बैंक लोन की देनदारियों को एआरसी को कौड़ियों के भाव (Peanuts) बेच देते हैं। आप मूल राशि का केवल 10% या 15% हिस्सा वसूलते हैं। एआरसी के लोग भी इसमें खूब पैसा कमाते हैं। लेकिन इसका सबसे अंतिम और असली लाभार्थी (Net Beneficiary) वह डिफ़ॉल्टर कर्जदार होता है, जो अंत में केवल 15 से 20 प्रतिशत रकम चुकाकर पूरी विधिक देनदारी से आसानी से साफ बाहर (Wriggles out) निकल जाता है।
‘कमर्शियल विजडम’ के नाम पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं
हालांकि अदालत ने माना कि वह बैंकों के ‘कमर्शियल विजडम’ (व्यावसायिक विवेक) के विधिक दायरे में सीमित हस्तक्षेप करती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि लापरवाही को छूट मिले। सीजेआई ने कहा, “यह कैसा व्यावसायिक विवेक है कि आप जनता का पैसा इकट्ठा करते हैं, उसे लापरवाही से लोन के रूप में बांट देते हैं, फिर वसूली का कोई गंभीर प्रयास नहीं करते और अंत में कह देते हैं कि अब कुछ भी वसूलने के लिए नहीं बचा? इस तरह का आचरण विधिक और नैतिक रूप से बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।”
मामला क्या है? (The JKM Infra Fraud Case)
यह पूरी सुनवाई जेकेएम इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड (JKM Infra Projects Ltd.) नामक नोएडा की एक इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी के खिलाफ दायर याचिका पर हो रही थी।
₹1537 करोड़ का लोन, ₹73 करोड़ में सेटलमेंट: याचिका के अनुसार, जेकेएम इंफ्रा ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के नेतृत्व वाले 7 बैंकों के कंसोर्टियम से भारी लोन लिया था। कुल ₹1,537 करोड़ की देनदारी को अंततः एआरसी (ARC) के माध्यम से मात्र ₹73.50 करोड़ में सेटल कर दिया गया। यानी जनता के पैसे का 95% से अधिक का नुकसान हुआ।
फॉरेंसिक ऑडिट में बड़ा खुलासा: वर्ष 2018 में ‘अर्नस्ट एंड यंग’ (Ernst & Young) द्वारा किए गए फॉरेंसिक ऑडिट में यह पाया गया था कि कंपनी ने ₹902 करोड़ से अधिक की राशि फर्जी कंपनियों (Shell Companies), बंद हो चुकी संस्थाओं, फर्जी इनवॉइस और अघोषित बैंक खातों के जरिए डाइवर्ट की थी। इसके बावजूद बैंक ने इस खाते को समय पर ‘फ्रॉड’ घोषित नहीं किया और लोन को एआरसी को ट्रांसफर कर दिया।
पारिवारिक विवाद की आड़: प्रतिवादी (कंपनी) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि यह याचिका दुर्भावना से प्रेरित है और दो भाइयों के आपसी विवाद का नतीजा है। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा, “हमें आपके पारिवारिक विवाद या व्यक्तिगत प्रतिशोध से कोई लेना-देना नहीं है। हमारे सामने ₹1,537 करोड़ के सार्वजनिक धन के घोटाले का विधिक सच आया है। भले ही यह याचिका किसी ने प्लांट की हो, लेकिन अदालत के सामने धोखाधड़ी आने के बाद हम अपनी आंखें बंद नहीं कर सकते।”
कोर्ट का विधिक आदेश: केंद्र और जांच एजेंसियों को नोटिस
अदालत ने इस मामले को बैंकिंग प्रणाली के भीतर मौजूद एक बड़े वित्तीय स्कैम का हिस्सा मानते हुए व्यापक विधिक कदम उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित पक्षों को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसमें भारत सरकार के गृह मंत्रालय (MHA) और वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) के माध्यम से, नियामक एवं बैंक में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), सेबी (SEBI), स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI), केनरा बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और जांच एजेंसियां सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO)। इसके अलावा एआरसी और कॉर्पोरेट्स: प्रूडेंट एआरसी (Prudent ARC), फोनिक्स एआरसी (Phoenix ARC), जेकेएम इंफ्रा प्रोजेक्ट्स और उसके प्रमोटर (गौरव जालान और वैभव जालान)।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक/मुख्य बिंदु | सर्वोच्च न्यायालय की विधिक कार्यवाही (जून 2026) |
| पीठ (Bench) | भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहाना। |
| याचिकाकर्ता के वकील | एडवोकेट अश्वनी कुमार दुबे और एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय। |
| आरोपी कंपनी | जेकेएम इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड (नोएडा)। |
| घोटाले का विधिक दायरा | ₹1,537 करोड़ का बकाया लोन, जिसे एआरसी के जरिए मात्र ₹73.50 करोड़ (95% बट्टा) में सेटल किया गया। |
| मुख्य विधिक चिंता | एनपीए (NPA) और सरफेसी एक्ट (SARFAESI Act) के तहत एआरसी (ARC) के गठन और उनकी कार्यप्रणाली के विधिक ढांचे की समीक्षा की आवश्यकता। |
| अदालत का अंतरिम निर्देश | केंद्र सरकार, आरबीआई, सेबी, एसएफआईओ और संबंधित बैंकों को 4 सप्ताह में जवाब दाखिल करने का नोटिस। |

