Tuesday, September 29, 2026
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5-Judge Bench: लंबित अपील के आधार पर कैदियों की छुट्टी या अस्थायी रिहाई को अनिश्चितकाल तक क्यों नहीं टाल सकते…यहां पढ़ें

5-Judge Bench: मद्रास हाईकोर्ट की 5-जजों की संविधान पीठ ने आपराधिक न्याय प्रणाली और कैदियों के मानवीय व संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक बेहद युगांतरकारी विधिक फैसला आया है।

5-Judge Bench ने कैदियों को मिलने वाली छुट्टी को लेकर व्यवस्था

अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि कैदियों को मिलने वाली छुट्टी (Leave) और अस्थायी रिहाई (Temporary Release) मानव गरिमा (Human Dignity) के अभिन्न अंग हैं, जिन्हें केवल इसलिए अनिश्चितकाल के लिए निलंबित नहीं किया जा सकता क्योंकि अदालत में उनकी अपील लंबित है। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी, जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन, जस्टिस ए.डी. जगदीश चंदिरा, जस्टिस एम. निर्मल कुमार और जस्टिस सुंदर मोहन की वृहद पीठ थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जेल में बंद होने मात्र से किसी नागरिक के मौलिक अधिकार खत्म नहीं हो जाते।

हाई कोर्ट की मुख्य विधिक टिप्पणी: “मौलिक अधिकार कोई कागजी वादा नहीं”

5-Judge Bench ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों की शक्तियों को रेखांकित करते हुए कहा, हमें यह दोहराना होगा कि कारावास (Incarceration) मौलिक अधिकारों को केवल एक ‘कागजी वादा’ (Parchment Promise) नहीं बना देता। इन अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 226 के तहत इस अदालत की शक्ति हमारे संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का एक अविनाशी हिस्सा है। हमारा यह सुविचारित मत है कि छुट्टी और अस्थायी रिहाई मानव गरिमा के ऐसे पहलू हैं जिन्हें केवल एक न्यायिक अपील लंबित होने के कारण अनिश्चितकाल के लिए निलंबित नहीं किया जा सकता।

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क्या था विधिक विवाद? (The Legal Dispute & Reference)

यह मामला नवंबर 2025 में एक खंडपीठ द्वारा मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए दो मुख्य कानूनी प्रश्नों (Reference) को हल करने के लिए गठित किया गया था। विवाद ‘तमिलनाडु सजा निलंबन नियम, 1982’ (Tamil Nadu Suspension of Sentence Rules, 1982) के तहत कैदियों को छुट्टी देने की शक्तियों को लेकर था, क्योंकि पूर्व में दो अलग-अलग पूर्ण पीठों (3-Judge Benches) के फैसलों में विरोधाभास था:

2011 का फैसला (State बनाम Yesu): इस पूर्ण पीठ ने कहा था कि प्रशासनिक रूप से मिलने वाली पैरोल (Parole) और 1982 के नियमों के तहत मिलने वाली सजा का निलंबन (Suspension of Sentence) दो अलग अवधारणाएं हैं। इसके तहत नियमों के दायरे से बाहर जाकर छुट्टी नहीं दी जा सकती।

2025 का फैसला (T Ramalakshmi बनाम State): इस पूर्ण पीठ ने इसके विपरीत व्यवस्था दी कि 1982 के नियमों के नियम 35 के तहत जेल अधिकारियों को कैदियों को सामान्य छुट्टी (Ordinary Leave) देने का अधिकार है। हालांकि, यदि कैदी किसी अन्य मामले में ट्रायल का सामना कर रहा है, तो उसकी अर्जी खारिज की जा सकती है।

5-Judge Bench: का विधिक विश्लेषण और अंतिम निष्कर्ष

मद्रास हाई कोर्ट की संविधान पीठ ने दोनों पक्षों और पुराने फैसलों का विश्लेषण करने के बाद निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत तय किए।

अपीलीय चरण वाले कैदियों पर भी नियम लागू

अदालत ने स्पष्ट किया कि 2011 के फैसले में इस बात पर विचार ही नहीं किया गया था कि क्या अपील लंबित रहने के दौरान छुट्टी दी जा सकती है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि आवश्यक निहितार्थों के अनुसार, 1982 के नियम उन सभी कैदियों के लिए ‘सुधारात्मक छुट्टी’ (Reformative Leave) का एक प्रभावी माध्यम हैं जो अपीलीय चरण (Appellate Stage) में हैं।

‘पैन-इंडिया’ नीति आने तक 2025 का फैसला रहेगा प्रभावी

अदालत ने नोट किया कि वर्तमान में यह पूरा विधिक मुद्दा भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष लंबित है, जहां शीर्ष अदालत पूरे देश के लिए एक समान ‘पैन-इंडिया’ (Pan-India) नीति तैयार करने की व्यवहार्यता का मूल्यांकन कर रही है। 5-जजों की पीठ ने निर्देश दिया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं ले लेता, तब तक साल 2025 का (टी. रामलक्ष्मी) फैसला ही प्रभावी रहेगा और उसी के अनुसार छुट्टियां तय होंगी।

जेल प्रशासन को कड़े निर्देश

5-Judge Bench ने जेल अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे कैदियों की सामान्य (Ordinary) और आपातकालीन (Emergency) छुट्टियों के आवेदनों को 1982 के नियमों और 2025 के न्यायिक आदेश के आलोक में त्वरित रूप से संसाधित (Process) करें।

5-Judge Bench: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक श्रेणियां / बिंदुमद्रास उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (5-जजों की वृहद पीठ)
पीठ के सदस्यमुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी, जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन, जस्टिस ए.डी. जगदीश चंदिरा, जस्टिस एम. निर्मल कुमार और जस्टिस सुंदर मोहन
प्रासंगिक कानून/नियमतमिलनाडु Suspension of Sentence Rules, 1982 (नियम 35 व 40) और संविधान का अनुच्छेद 226
मुख्य कानूनी प्रश्नक्या अपील लंबित होने के दौरान किसी दोषी कैदी को 1982 के नियमों के तहत सुधारात्मक या सामान्य छुट्टी दी जा सकती है?
अदालत का विधिक स्टैंडहाँ। अपील का लंबित होना कैदी के छुट्टी के अधिकार को अनिश्चितकाल के लिए नहीं छीन सकता। यह उसकी मानव गरिमा और सुधारात्मक न्याय का हिस्सा है।
अंतिम विधिक निर्देशसुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने तक साल 2025 का पूर्ण पीठ का आदेश प्रभावी रहेगा; जेल अधिकारी उसी के अनुसार आवेदनों का निपटारा करें।
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