No Advertisement: सार्वजनिक रोजगार में पारदर्शिता और कर्मचारियों के हितों की रक्षा के बीच बेहतरीन संतुलन बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
तकनीकी नियमों का हवाला देकर कर्मचारियों की नियुक्तियां रद्द कर दी गई थीं
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस फैसले को पूरी तरह रद्द (Set Aside) कर दिया है, जिसके तहत तकनीकी नियमों का हवाला देकर कर्मचारियों की नियुक्तियां रद्द कर दी गई थीं। शीर्ष अदालत ने कहा, सरकारी या सार्वजनिक संस्थाओं में नियुक्तियों के लिए विज्ञापन (Advertisement), पारदर्शिता (Transparency) और समान अवसर (Equal Opportunity) देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत अनिवार्य है। यदि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष रही हो, पदों का विज्ञापन जारी किया गया हो और योग्यता के आधार पर चयन हुआ हो, तो केवल भर्ती अधिकारियों की किसी प्रक्रियात्मक चूक (Procedural Lapse) या तकनीकी कमी के कारण सालों से काम कर रहे कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता।
मामला क्या है?: 2014 की नियुक्तियां, अधिकारियों की अनुपस्थिति पर गिरी गाज
यह पूरा विवाद कुरुक्षेत्र (हरियाणा) की एक सहकारी समिति में 2014 में हुई भर्तियों से जुड़ा है।
नियुक्ति और सेवा: गौरव मेहला और अन्य आवेदकों को साल 2014 में ‘थानेसर को-ऑपरेटिव मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसाइटी लिमिटेड’ में क्लर्क-कम-सेल्समैन और पीन-कम-चौकीदार के पदों पर नियुक्त किया गया था। यह नियुक्तियां सार्वजनिक विज्ञापन जारी करने और रजिस्ट्रार की मंजूरी के बाद की गई थीं।
बर्खास्तगी का आधार: कई साल की सेवा के बाद उनकी नियुक्तियों को इस तकनीकी आधार पर रद्द कर दिया गया कि यह भर्ती ‘सर्विस रूल्स, 2003 के संशोधित नियम 3’ का उल्लंघन करती है। नियमों के मुताबिक, जब नियुक्तियों को मंजूरी दी जा रही थी, तब प्रबंधक समिति की बैठक में सहायक रजिस्ट्रार, सहकारी समिति निरीक्षक और हैफेड (HAFED) के जिला प्रबंधक की उपस्थिति और सहमति अनिवार्य थी, जो उस दिन मौजूद नहीं थे।
हाईकोर्ट बनाम सुप्रीम कोर्ट: विपक्ष का तर्क था कि इन तीन अधिकारियों की अनुपस्थिति के कारण यह नियुक्तियां शुरुआत से ही शून्य (Void ab initio) थीं। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी इस तर्क को सही मानते हुए नियुक्तियां रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा, जिसके खिलाफ कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।
सुप्रीम कोर्ट की विधिक व्याख्या: कब रद्द हो सकती है कोई भर्ती प्रक्रिया?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह सहकारी समिति हरियाणा सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1984 के तहत काम करती है, इसलिए इसे एक निजी संस्था नहीं माना जा सकता। यह एक सार्वजनिक इकाई (Public Entity) की तरह है, जहां संवैधानिक नियम लागू होते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भर्ती को केवल दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
बुनियादी खामी (Fundamental Defect) जो पूरी भर्ती को अवैध बनाती है
अदालत ने कहा कि अगर किसी सरकारी नौकरी में निम्नलिखित में से कोई भी कमी पाई जाती है, तो वह पूरी प्रक्रिया को जड़ से खत्म करने (रद्द करने) के लिए पर्याप्त है। यदि पदों का कोई सार्वजनिक विज्ञापन (No Advertisement) जारी न किया गया हो, क्योंकि यह योग्य उम्मीदवारों को समान अवसर से वंचित करता है। यदि चयन प्रक्रिया में धोखाधड़ी, हेरफेर या दुर्भावना (Fraud or Mala fides) शामिल हो। यदि बिना योग्यता, अनुभव या मेरिट देखे अयोग्य उम्मीदवारों (Ineligible Candidates) को चुन लिया गया हो। इस मामले में, कोर्ट ने पाया कि भर्ती में ऐसी कोई भी बुनियादी या गंभीर धांधली नहीं हुई थी।
प्रक्रियात्मक कमी (Procedural Deficiency) जिसे सुधारा जा सकता है
खंडपीठ ने माना कि निदेशक मंडल (Board of Directors) की बैठक में तीन सरकारी अधिकारियों का अनुपस्थित रहना केवल एक ‘प्रक्रियात्मक कमी’ थी, कोई ‘बुनियादी दोष’ नहीं। हमारी राय में, नियम 3 के तहत अनिवार्य माने जाने वाले अधिकारियों की अनुपस्थिति रूपी यह कमी पूरी भर्ती प्रक्रिया को अवैध नहीं ठहरा सकती। कर्मचारियों को उन प्रशासनिक गलतियों या चूकों का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए, जो उनके नियंत्रण से बाहर थीं और जिन्हें अधिकारियों द्वारा अंजाम दिया गया था।
केस शीट: सुप्रीम कोर्ट सार्वजनिक रोजगार विधिक समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह |
| अपीलकर्ता (Appellants) | गौरव मेहला और अन्य कर्मचारी |
| प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान | संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) एवं अनुच्छेद 15 |
| विवादित नियम | प्राथमिक सहकारी सेवा नियम, 2003 का नियम 3 बनाम नियम 35 |
| अदालत का अंतिम निर्णय | कर्मचारियों की अपील स्वीकार; हाईकोर्ट का 29 जुलाई 2025 का आदेश रद्द और बहाली के निर्देश। |
सुप्रीम कोर्ट का सुधारात्मक निर्देश और राहत
अदालत ने इस तकनीकी खामी को ‘सुधारने योग्य’ (Curable) मानते हुए निम्नलिखित व्यावहारिक निर्देश दिए हैं।
दोबारा बैठक का आदेश: प्रतिवादी सहकारी समिति को एक महीने के भीतर अपने निदेशक मंडल की एक नई बैठक बुलाने का निर्देश दिया गया है। इस बैठक में सहायक रजिस्ट्रार, को-ऑपरेटिव इंस्पेक्टर और हैफेड के जिला प्रबंधक अनिवार्य रूप से शामिल होंगे।
सीमित समीक्षा: यह पुनर्गठित बोर्ड केवल अंतिम चरण की ‘मंजूरी’ (Approval) की समीक्षा करेगा। वे भर्ती के पिछले चरणों (जैसे विज्ञापन या इंटरव्यू प्रक्रिया) को दोबारा नहीं खोलेंगे।
पुनर्नियुक्ति और वरिष्ठता: यदि अपीलकर्ता (कर्मचारी) सभी योग्यताओं को पूरा करते हैं और किसी अन्य कारण से अयोग्य नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत बहाल (Reappointed) किया जाएगा। उनकी पिछली सेवा को वरिष्ठता और सभी लाभों के लिए गिना जाएगा, हालांकि वे सेवा से बाहर रहे कार्य-अवधि के पिछले वेतन (Backwages/Arrears) के हकदार नहीं होंगे।

