Family Matter: महिलाओं और बच्चों के भरण-पोषण के कानूनी अधिकारों को और अधिक मानवीय व व्यावहारिक धरातल देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस अचल सचदेव की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि पारिवारिक अदालतों को ऐसे मामलों में पूरी तरह पारंपरिक या केवल तकनीकी नजरिया अपनाने के बजाय ‘सामाजिक संदर्भ’ (Socially Contextual Approach) को ध्यान में रखना चाहिए। हाई कोर्ट ने महाराजगंज की फैमिली कोर्ट के उस फैसले को आंशिक रूप से रद्द (Set Aside) कर दिया है, जिसने शादी का सर्टिफिकेट न होने के कारण एक पत्नी की भरण-पोषण की अर्जी को खारिज कर दिया था।
यह रही अदालत की टिप्पणी
अदालत ने कहा, जब एक पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह एक साथ (Cohabitation) रहे हों और उनके संबंधों की पुष्टि हो चुकी हो, तो दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण (Maintenance) के अधिकार को खारिज करने के लिए ‘वैध शादी के कड़े दस्तावेजी सबूतों’ की जिद नहीं की जा सकती। कानून की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो समाज के कमजोर वर्ग को न्याय दे, न कि तकनीकी कमियों का बहाना बनाकर किसी लाचार महिला को खाली हाथ लौटा दे।”
मामला क्या है?: कोर्ट मैरिज का आवेदन, साथ रहे, बच्चा हुआ… फिर मुकरा पति
यह संवेदनशील कानूनी विवाद महाराजगंज और गोरखपुर क्षेत्र से जुड़ा है।
पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता (महिला) ने कोर्ट में अर्जी दाखिल कर बताया था कि उसने और उसके पार्टनर ने सितंबर 2017 में कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन किया था। इसके बाद वे दोनों साथ रहने लगे। लेकिन कुछ समय बाद पति और ससुराल वालों ने कार (फोर-व्हीलर) और अतिरिक्त दहेज की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। अंततः उसे उसके छोटे बेटे के साथ घर से निकाल दिया गया। महिला ने अपने लिए ₹25,000 और बेटे के लिए ₹15,000 प्रति माह भरण-पोषण की मांग की थी।
पति का यू-टर्न: पति (जो गोरखपुर में सरकारी क्वार्टर में रहता है) ने कोर्ट में यह तो स्वीकार किया कि उन्होंने कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन किया था लेकिन वह शादी कभी कानूनी रूप से पूरी नहीं हो सकी। उसने यह भी माना कि महिला उसके साथ सरकारी क्वार्टर में रही और दोनों का एक बेटा भी है, लेकिन उसने प्रताड़ना के आरोपों को गलत बताया।
फैमिली कोर्ट की बड़ी चूक: मार्च 2024 में फैमिली कोर्ट, महाराजगंज के प्रिंसिपल जज ने महिला की याचिका को सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि उसके पास शादी का केवल एक फोटोकॉपी नोटिस था, कोई पक्का मैरिज सर्टिफिकेट नहीं था। हालांकि, अदालत ने उसी आदेश में उनके बेटे को ‘अवैध’ (Illegitimate) मानते हुए पिता को ₹5,000 प्रति माह देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ महिला ने हाई कोर्ट में रिवीजन पिटीशन दायर की।
हाई कोर्ट की विधिक व्याख्या: मैकेनिकल रवैये पर जज की सख्त नाराजगी
जस्टिस अचल सचदेव ने फैमिली कोर्ट के आदेश की समीक्षा करते हुए निचली अदालत के जज के रवैये को “पूरी तरह से दिमाग का इस्तेमाल न करने वाला और यांत्रिक (Mechanical Manner)” करार दिया। हाई कोर्ट ने निम्नलिखित मुख्य विधिक सिद्धांत सामने रखे:
खुद पति का कबूलनामा ही सबसे बड़ा सबूत है
हाई कोर्ट ने नोट किया कि फैमिली कोर्ट के जज ने पति के उस बयान को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जिसमें उसने खुद माना था कि वे दोनों लंबे समय तक साथ रहे, शुरुआत में शादी करना चाहते थे और उनका एक बच्चा भी है। जब पति खुद एक छत के नीचे रहने की बात स्वीकार कर रहा है, तो पत्नी को केवल मैरिज सर्टिफिकेट न होने के कारण भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के ‘बादशाह’ केस की नज़ीर
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘बादशाह बनाम उर्मिला बादशाह गोडसे (2014)’ का हवाला देते हुए कहा कि धारा 125 CrPC का मुख्य उद्देश्य महिलाओं और बच्चों को भुखमरी व बेसहारा होने से बचाना है। यह एक सामाजिक कल्याणकारी कानून है। “जब लगातार साथ रहने (Continuous Cohabitation) से पति-पत्नी का रिश्ता स्थापित हो जाता है, तो तकनीकी बारीकियों का इस्तेमाल भरण-पोषण को रोकने के लिए हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता।”
‘अवैध’ बच्चे का भी पूरा हक
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बच्चे को ₹5,000 प्रति माह देने के फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने याद दिलाया कि धारा 125 CrPC के तहत एक पिता अपनी वैध (Legitimate) और अवैध (Illegitimate) दोनों ही संतानों का भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।
केस शीट: इलाहाबाद हाई कोर्ट भरण-पोषण विधिक समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अचल सचदेव (एकल पीठ) |
| विवादित आदेश | फैमिली कोर्ट, महाराजगंज का मार्च 2024 का आदेश |
| प्रासंगिक कानून | दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 (अब BNSS के तहत संबंधित धारा) |
| सर्वोच्च न्यायालय की नज़ीर | Badshah vs Urmila Badshah Godse & Anr (2014) |
| अदालत का अंतिम निर्णय | पत्नी की याचिका खारिज करने का आदेश रद्द; फैमिली कोर्ट को 3 महीने में दोबारा फैसला करने का निर्देश। |
आगे क्या होगा?: ‘रजनीश गाइडलाइंस’ के तहत दोबारा सुनवाई
हाई कोर्ट ने इस मामले को वापस (Remand) फैमिली कोर्ट भेज दिया है और निर्देश दिया है कि
दोनों पक्ष (पति और पत्नी) सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध ‘रजनीश बनाम नेहा’ (Rajnesh Guidelines) मामले के अनुसार अपनी संपत्तियों और आय का पूरा ब्योरा देने वाला ‘फाइनेंशियल डिस्क्लोज़र एफिडेविट’ (Financial Disclosure Affidavit) दाखिल करें।
फैमिली कोर्ट इस मामले की दोबारा त्वरित सुनवाई करे और तीन महीने के भीतर इसका अंतिम निपटारा करे।

