Sunday, July 12, 2026
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Client Authorise: अंतरात्मा को झकझोरने वाली घटना…ऐसा पहली बार है क्या: वकील पर बिना मर्जी वकालतनामा’ लगाने का आरोप, होगी जांच

Client Authorise: अदालती कार्यवाही की शुचिता और वकालतनामा (Vakalatnama) के गलत इस्तेमाल को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक बेहद कड़ा रुख अपनाया है।

याचिकाकर्ता के आरोप पर बिठाई जांच

हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने एक याचिकाकर्ता के उस सनसनीखेज आरोप के बाद उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं, जिसमें उसने दावा किया था कि उसने कभी किसी वकील को अपने केस की पैरवी करने या कोर्ट में पेश होने के लिए अधिकृत (Authorise) ही नहीं किया था, फिर भी उसकी तरफ से ‘फर्जी वकालतनामा’ लगाकर केस का निस्तारण करवा दिया गया। मामले की संजीदगी को देखते हुए कोर्ट ने पुराने सभी रिकॉर्ड्स को सीलबंद लिफाफे में तलब किया है।

अदालत ने कहा, यदि कोई वकील किसी मुवक्किल (Client) की बिना मर्जी, बिना हस्ताक्षर और बिना किसी अधिकार के उसकी तरफ से अदालत में पेश हो जाता है, तो यह न्याय प्रशासन के लिए एक बेहद गंभीर और खतरनाक स्थिति है। समीक्षा याचिका (Review Application) में लगाए गए ये आरोप इतने गंभीर हैं कि इन्होंने ‘अदालत की अंतरात्मा को झकझोर’ (Shaken the Conscience of the Court) दिया है। इसकी तह तक जाना और सच्चाई का पता लगाना अनिवार्य है।”

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मामला क्या है?: नेहरू विद्यापीठ गाजीपुर के विवाद में ‘फर्जी’ पैरवी का खेल

यह पूरा विवाद गाजीपुर के नेहरू विद्यापीठ इंटर कॉलेज के प्रबंधन और उसकी सोसाइटी को एक ‘ट्रस्ट’ में बदलने के विवाद से जुड़ा है।

मूल रिट याचिका: कॉलेज प्रबंधन से जुड़े एक मामले में मुख्य रिट याचिका दायर की गई थी, जिसमें शिव शंकर सिंह (यादव) को प्रतिवादी संख्या-6 (Respondent No. 6) बनाया गया था। इस रिट याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को 48 घंटे के भीतर अपनी आपत्तियां दर्ज कराने की छूट देते हुए केस का निस्तारण (Disposed of) कर दिया था। कोर्ट रूम में शिव शंकर सिंह की तरफ से एक वकील बकायदा पेश हुए थे और उन्होंने अपनी दलीलें भी रखी थीं।

याचिकाकर्ता का दावा: इसके बाद शिव शंकर सिंह ने कोर्ट में एक विशेष अपील (Intra-Court Appeal) और फिर ‘रिव्यू पिटीशन’ दाखिल कर सबको चौंका दिया। सिंह ने दावा किया कि उन्होंने रिट याचिका के दौरान न तो किसी वकील को नियुक्त किया, न किसी वकालतनामे पर हस्ताक्षर किए और न ही कोई कैविएट (Caveat) दाखिल की। उनकी मर्जी के बिना ही कोई वकील उनकी तरफ से खड़ा हो गया। उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट के सामने दिया गया यह बयान कि आखिरी निर्विवाद चुनाव 2009 में हुए थे, पूरी तरह गलत है।

हस्ताक्षरों में अंतर: जब जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने खुद रिव्यू पिटीशन में किए गए शिव शंकर सिंह के हस्ताक्षरों और पहले दाखिल की गई कैविएट/वकालतनामे के हस्ताक्षरों का मिलान किया, तो शुरुआती नजर में वे बिल्कुल अलग (Different) पाए गए।

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कोर्ट में वकीलों की जिरह: ‘ब्लैकमेलिंग’ या ‘फर्जीवाड़ा’?

इस मामले के सामने आने के बाद कोर्ट रूम में दो विधिक पक्षों के बीच तीखी बहस देखने को मिली।

पूर्व वकील का पक्ष: ‘मुवक्किल के फायदे की राजनीति’

शिव शंकर सिंह की तरफ से पहले पेश होने वाले वकील ने अदालत के सामने एक व्यक्तिगत हलफनामा (Personal Affidavit) दायर कर इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने दावा किया कि शिव शंकर सिंह वर्ष 2015 से उनके नियमित क्लाइंट हैं। वकील ने कहा, यह मुवक्किल सरासर झूठ बोल रहा है। यह अपने भतीजे के साथ खुद मेरे दफ्तर आया था और मेरे क्लर्क को हस्ताक्षरित वकालतनामा और ₹2,500 फीस देकर गया था। आजकल ऐसे कई चालाक क्लाइंट होने लगे हैं, जो पहले हाई कोर्ट से आदेश ले लेते हैं, और बाद में जब उन्हें लगता है कि यह आदेश उनके राजनीतिक या व्यक्तिगत हित में नहीं है, तो वे नया वकील करके पुराने वकील पर ही फर्जीवाड़े का आरोप लगा देते हैं ताकि पुराना आदेश वापस (Recall) हो जाए।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख और जांच का आदेश

अदालत ने माना कि चूंकि यह मामला सीधे तौर पर न्याय व्यवस्था की साख से जुड़ा है, इसलिए इसे हल्के में नहीं छोड़ा जा सकता। कोर्ट ने आदेश दिया कि शिव शंकर सिंह द्वारा वर्ष 2015 से अब तक संबंधित वकील के माध्यम से दायर की गई सभी रिट याचिकाओं के मूल रिकॉर्ड और वकालतनामे सीलबंद कवर (Sealed Cover) में अदालत के समक्ष पेश किए जाएं ताकि हस्ताक्षरों की फॉरेंसिक या विस्तृत जांच की जा सके। कोर्ट इस बात की भी जांच करेगा कि क्या अदालत के समक्ष जानबूझकर रिकॉर्ड के विपरीत विरोधाभासी और झूठे बयान दिए गए थे।

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केस शीट: इलाहाबाद हाई कोर्ट वकालतनामा विवाद (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और विवरण
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज
माननीय न्यायाधीशजस्टिस सिद्धार्थ नंदन (एकल पीठ)
समीक्षा याचिकाकर्ताशिव शंकर सिंह (यादव) – प्रतिवादी संख्या-6
विवाद का मुख्य विषयबिना सहमति और बिना हस्ताक्षर के ‘फर्जी वकालतनामा’ पेश करने का आरोप।
अदालत का अंतरिम आदेशविस्तृत जांच के आदेश; पुराने सभी वकालतनामे सीलबंद लिफाफे में तलब।
अगली सुनवाई की तिथि13 जुलाई, 2026
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