Sexual Autonomy: महिलाओं के डिजिटल अधिकारों और संवैधानिक स्वतंत्रता को एक नया आयाम देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और प्रगतिशील फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने पीड़िता के गुप्त वीडियो के जरिए उसे ब्लैकमेल करने वाले आरोपी ‘विजयकुमार’ की दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखा है। अदालत ने सदियों पुरानी पुरुषसत्तात्मक (Patriarchal) परिभाषा को बदलते हुए ‘सतीत्व/पवित्रता’ (Chastity) और ‘अपवित्रता/लांछन’ (Unchastity) शब्द की एक नई संवैधानिक व्याख्या देश के सामने रखी है।
यह कहता है IPC की धारा 506 भाग-II
अदालत ने कहा, “किसी महिला को चुपके से नहाते समय रिकॉर्ड करना और उस न्यूड (नग्न) वीडियो को सोशल मीडिया पर अपलोड करने की धमकी देना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 506 भाग-II के तहत उसके ‘चरित्र पर लांछन’ (Imputing Unchastity) लगाने के समान है। डिजिटल युग में किसी महिला का ऐसा वीडियो सार्वजनिक करने की महज धमकी भी उसके लिए अत्यंत कष्टदायक और डरावनी स्थिति है, जो उसकी यौन स्वायत्तता (Sexual Autonomy), गरिमा और निजता (Privacy) का घोर उल्लंघन है।
मामला क्या है?: 2015 का प्रेम संबंध, ब्रेकअप के बाद फेसबुक पर वीडियो डालने की धमकी
यह कानूनी विवाद तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले से शुरू हुआ था, जिसकी पृष्ठभूमि इस प्रकार है।
घटनाक्रम: साल 2015 में एक महिला ने गिंगी (Gingee) के ऑल विमेन पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। उसने आरोप लगाया कि वह आरोपी विजयकुमार के साथ दो साल से रिलेशनशिप में थी। इस दौरान आरोपी ने चुपके से उसका नहाते हुए वीडियो रिकॉर्ड कर लिया था। जब उनके रिश्ते में खटास आई और संबंध टूट गया, तो आरोपी ने उस वीडियो को फेसबुक (Facebook) पर अपलोड करने की धमकी देकर उसे डराना-धमकाना शुरू कर दिया।
निचली अदालतों का फैसला: विल्लुपुरम की ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म (Rape) के आरोपों से तो बरी कर दिया, लेकिन आपराधिक धमकी (Criminal Intimidation) के लिए धारा 506 भाग-II IPC के तहत दोषी ठहराया। 28 फरवरी, 2024 को मद्रास उच्च न्यायालय ने भी इस सजा को बरकरार रखा, जिसके खिलाफ आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।
सुप्रीम कोर्ट की विधिक व्याख्या: पितृसत्तात्मक नैतिकता से आज़ाद हुआ ‘सतीत्व’ (Chastity)
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की अपील को खारिज करते हुए महिलाओं की यौन स्वतंत्रता और निजता के पक्ष में कई बड़े सिद्धांत प्रतिपादित किए।
‘सतीत्व’ (Chastity) का मतलब सामाजिक रूढ़िवादिता नहीं, ‘महिला की अपनी पसंद’ है
अदालत ने ऐतिहासिक जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2019) फैसले (जिसमें व्यभिचार/Adultery को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया था) का हवाला देते हुए कहा कि ‘सतीत्व’ को पारंपरिक पुरुषसत्तात्मक नैतिकता के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। “एक महिला के सतीत्व (Chastity) को आत्म-निर्णय की स्वतंत्रता के आलोक में उसकी अपनी यौन प्राथमिकताओं और विकल्पों पर नियंत्रण के रूप में समझा जाना चाहिए। यह किसी अन्य के हस्तक्षेप के बिना अपनी शर्तों पर यौन संबंध स्थापित करने या न करने की क्षमता है।”
‘Unchastity’ (चरित्रहीनता का लांछन) की नई परिभाषा
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘Unchastity’ का मतलब पारंपरिक रूप से किसी महिला के चरित्र पर उंगली उठाना मात्र नहीं है, बल्कि कोई भी ऐसा कृत्य जो किसी व्यक्ति के सहमतिपूर्ण यौन जीवन की निजता और स्वायत्तता में हस्तक्षेप करता है, वह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता और गरिमा का उल्लंघन है। किसी महिला की मर्जी के बिना उसके निजी अंगों या नग्न अवस्था की तस्वीरों/वीडियो को सार्वजनिक करने की धमकी देना सीधे तौर पर उसकी यौन स्वायत्तता पर हमला है, और यह धारा 506 भाग-II के तहत उसके चरित्र पर लांछन (Impute Unchastity) लगाने के दायरे में आता है।
मोबाइल फोन का न मिलना अभियोजन के लिए घातक नहीं
आरोपी के वकील ने दलील दी थी कि पुलिस को वह मोबाइल फोन ही नहीं मिला जिसमें वीडियो रिकॉर्ड किया गया था, इसलिए अपराध साबित नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि डिजिटल साक्ष्य के भौतिक रूप से न मिलने मात्र से पीड़िता का केस कमजोर नहीं होता। पीड़िता की गवाही विश्वसनीय है और उसकी बहनों के बयानों से इसकी पुष्टि होती है, जो आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पूरी तरह पर्याप्त है।
केस शीट: सुप्रीम कोर्ट धारा 506 IPC डिजिटल गरिमा समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह |
| आरोपी/अपीलकर्ता | विजयकुमार |
| प्रासंगिक कानून धारा | धारा 503, 506 भाग-II IPC [अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 351(3)] |
| संवैधानिक अधिकार | अनुच्छेद 21 (निजता, गरिमा और यौन आत्म-निर्णय का अधिकार) |
| अदालत का अंतिम निर्णय | दोषसिद्धि बरकरार; लेकिन घटना के 11 साल पुराने (2015) होने के कारण सजा को 3 साल से घटाकर ‘अब तक काटी गई अवधि’ (Period Already Undergone) किया गया। |
बाथरूम में निजता का पूर्ण अधिकार
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि जब कोई व्यक्ति बाथरूम में कपड़े उतारता है, तो उसके पास निजता की एक तार्किक और पूर्ण अपेक्षा (Reasonable Expectation of Privacy) होती है। भले ही उस वीडियो में कोई पारंपरिक यौन कृत्य (Conventional Sexual Act) न दिखाया गया हो, लेकिन डिजिटल युग में ऐसी संवेदनशील कड़ियों को मॉर्फ (हेरफेर) करके इंटरनेट पर वायरल करना किसी भी महिला की प्रतिष्ठा और मानसिक स्वास्थ्य को पूरी तरह तबाह कर सकता है। इसलिए इसे धारा 503 के तहत ‘अलार्म’ (गंभीर भय) पैदा करने वाला कृत्य माना जाएगा।

