Will Validation: पारिवारिक संपत्ति और वसीयत के विवादों पर एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
गैर रजिस्टर्ड वसीयता भी चलेगा, बशर्ते गवाह उसे साबित करे: अदालत
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने स्पष्ट किया कि गैर-रजिस्टर्ड वसीयत पूरी तरह वैध है, बशर्ते उसे कानून के अनुसार गवाहों द्वारा साबित किया गया हो। अदालत ने कहा, “भारत में वसीयत (Will) का रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण) कराना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। इसलिए, केवल इस आधार पर किसी वसीयत की प्रामाणिकता पर संदेह नहीं किया जा सकता कि वह रजिस्टर्ड नहीं है। इसके अलावा, वसीयत में अपनी पत्नी या बच्चों (स्वाभाविक वारिसों) को संपत्ति से बेदखल कर देना भी वसीयत को संदिग्ध नहीं बनाता, क्योंकि वसीयत लिखने का मूल उद्देश्य ही उत्तराधिकार के सामान्य नियम को बदलना होता है।
मामला क्या है?: चार्टर्ड अकाउंटेंट ने पत्नी-बच्चों के बजाय बहन को दी संपत्ति
यह कानूनी विवाद कर्नाटक के उडुपी की कृषि संपत्तियों और एक पारिवारिक वसीयत से जुड़ा है।
पृष्ठभूमि: बी. शीना नायरी (B. Sheena Nairi) मुंबई के एक प्रतिष्ठित चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) थे। उनके पास मुंबई में एक आवासीय फ्लैट के अलावा कर्नाटक के उडुपी तालुक के ब्रह्मवर और चंतार गांवों में पैतृक और कृषि संपत्तियां थीं।
वसीयत का विवाद: उन्होंने 1983 में एक वसीयत निष्पादित (Execute) की थी, जिसमें उन्होंने उडुपी की अपनी पूरी संपत्ति अपनी पत्नी और बच्चों के बजाय अपनी बहन ‘लक्ष्मी नैरथी’ के नाम कर दी थी।
अदालती लड़ाई: शीना नायरी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी और बच्चों ने इस वसीयत को यह कहते हुए चुनौती दी कि यह फर्जी और मनगढ़ंत है। उनका एक बड़ा तर्क यह भी था कि यह वसीयत रजिस्टर्ड नहीं है और इसमें परिवार के स्वाभाविक वारिसों (पत्नी-बच्चों) को बिना वजह संपत्ति से बाहर कर दिया गया है। ट्रायल कोर्ट, प्रथम अपीलीय अदालत और कर्नाटक हाई कोर्ट तीनों ने वसीयत को सही माना था, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट की विधिक व्याख्या: वसीयत और उत्तराधिकार के 3 बड़े नियम
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों को बरकरार रखते हुए वसीयत (Will) से जुड़े तीन बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को दोहराया।
वसीयत का गैर-रजिस्टर्ड होना कोई ‘संदिग्ध परिस्थिति’ नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने साल 1953 के ईश्वरदेव नारायण सिंह बनाम कामता देवी मामले का हवाला देते हुए साफ किया कि भारतीय कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है जो वसीयत के पंजीकरण को अनिवार्य बनाता हो। ज्यादातर मामलों में वसीयत रजिस्टर्ड नहीं होती है। केवल इस आधार पर कि वसीयत का रजिस्ट्रेशन नहीं कराया गया है, उसके असली होने पर संदेह करना पूरी तरह से अनुचित और निराधार है।
स्वाभाविक वारिसों (Natural Heirs) को बाहर करना वसीयत का मूल स्वभाव है
अदालत ने अपीलकर्ताओं (पत्नी और बच्चों) के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने खुद को संपत्ति से बाहर रखने को ‘संदिग्ध’ बताया था। कोर्ट ने कहा, वसीयत निष्पादित करने का पूरा विचार ही यही होता है कि संपत्ति के उत्तराधिकार की सामान्य कतार (Normal Line of Succession) में हस्तक्षेप किया जाए। इसलिए, अगर कोई व्यक्ति अपने बच्चों या पत्नी को छोड़कर किसी अन्य (जैसे बहन) को संपत्ति देता है, तो इसे अपने आप में कोई संदिग्ध परिस्थिति नहीं माना जा सकता।
म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) से मालिकाना हक नहीं मिलता
जायदाद के मुकदमों से जुड़ा एक और बड़ा नियम स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा कि राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में होने वाली म्यूटेशन एंट्रीज (Mutation Entries / दाखिल-खारिज) से किसी व्यक्ति को संपत्ति का मालिकाना हक (Title) नहीं मिल जाता। ये प्रविष्टियां केवल वित्तीय या टैक्स (Fiscal) उद्देश्यों के लिए होती हैं। मालिकाना हक केवल वैध दस्तावेजों (जैसे वसीयत या सेल डीड) से ही तय होता है।
केस शीट: सुप्रीम कोर्ट वसीयत वैधता विधिक समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस विजय बिश्नोई |
| मूल मामला | बी. शीना नायरी द्वारा 1983 में निष्पादित गैर-रजिस्टर्ड वसीयत का विवाद |
| प्रासंगिक कानूनी स्थिति | वसीयत का पंजीकरण स्वैच्छिक (Optional) है, अनिवार्य नहीं। |
| प्रमुख विधिक सिद्धांत | 1. गैर-पंजीकरण से वसीयत अवैध नहीं होती। 2. म्यूटेशन से मालिकाना हक (Title) नहीं मिलता। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | पत्नी और बच्चों की अपील खारिज; बहन के पक्ष में की गई वसीयत को पूरी तरह वैध माना गया। |
वसीयत को सही साबित करने का कानूनी पैमाना क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी वसीयत (चाहे वह रजिस्टर्ड हो या अन-रजिस्टर्ड) को वैध मानने के लिए अदालत दो मुख्य बातें देखती है।
गवाहों की गवाही (Attesting Witness): वसीयत को प्रमाणित करने वाले गवाह ने अदालत में आकर यह पुष्टि की हो कि वसीयतकर्ता (Testator) ने उसके सामने हस्ताक्षर किए थे। इस मामले में गवाह ने इसकी पुष्टि की।
स्वस्थ दिमाग (Sound State of Mind): वसीयत लिखते समय व्यक्ति मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हो और उसने किसी दबाव के बिना, स्वेच्छा से इसे लिखा हो। अपीलकर्ता (पत्नी-बच्चे) कोर्ट में यह साबित करने के लिए कोई पुख्ता सबूत या दस्तावेज पेश नहीं कर पाए कि वसीयत फर्जी थी या धोखाधड़ी से तैयार की गई थी।

